आलोक भाई अभी अभी अमरीका से हो कर गए हैं, शायद यहाँ से कुछ खास चीज खाकर गए हैं ( समीर जी व जीतू भाई अफसोस आलोक अपुन पियक्कड़ो जैसे नहीं हैं, नहीं तो लिखता खा-पीकर गए हैं)। इस लिए की जाते ही फटाक फटाक दो “बड़ी सी” प्रविष्टियां लिख डाली। बड़ी सी पर जोर इस लिए दे रहा हूँ कि आलोक अपनी कम लिखे को ज्यादा समझना – तार को खते समझना जैसी ब्लॉग पोस्टों के लिए बदनाम प्रसिद्ध हैं। खैर अगर ऐसी कोई बात है तो मैं आलोक से इस खाने वाली चीज के बारे में जरुर जानना चाहुंगा। श्रीमती जी कैमिस्ट्री की रिसर्च-स्नातक हैं उनसे कह कर इस चीज के अंदर के विटामिन निकलवाकर – बड़ी पोस्ट लिखने की गोली बना-बना कर बेचेंगे।

वैसे लिखना तो आलोक को पहले चाहिए था कि अमरीका उन्हें कैसा लगा। वैसा ही जैसा वे सोचते था या अलग। पर उन्होंने अपनी सोच की छिपकली सभी पर छोड़ दी अभी भाई लोग अनुगूंज में सोच सोच कर लिख रहे हैं। अब बड़े भाई ने कहा है तो लिखना तो पड़ेगा ही। तो लीजिए हमारी भी श्वेत-श्याम आहुति इस 22वीं अनुगूंज में।

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कुछ दिन पहले सौतन के बेटे (मेरा मोबाइल जिस पर ईमेल आती है) ने आलोक का कम-लिखे-को-ज्यादा समझने वाला संदेश दिया कि “भई हम आपके देश में है, समय मिले तो फोन कीजिएगा”। हमारी खुशी का ठिकाना नहीं कि चलिए आखिरकार आलोक से मिलना हो पाएगा। आलोक भाई ने अंतर्जाल पर हिन्दी का पहला जाल बिछाया था तो इस नजर से वे हैं हिन्दी के पहले स्पाइडर मैन साथ ही वे मेरे कॉलेज के सुपर सीनियर (जिनसे आप कॉलेज में न मिले हों) भी हैं इसलिए बाते भी करने को काफी होंगी।

फोन लगाया तो पता लगा कि वे सिलिकन वैली पधार रहे हैं व गूगल वालों से भी मिलेंगे। भई वाह हम पड़ोस में रहते हैं पर आजतक उन लोगों से हिन्दी के बारे में बात करने नहीं गए। आलोक भाई उनसे मिले भी व उनसे हिन्दी के बारे में चर्चा भी की। इस बारे में आगे लिखूंगा। वहाँ गूगल वालों ने क्या खिलाया यह तो वे स्वयं ही बताएंगे। खैर फोन पर तय हुआ कि हम लोग साथ साथ सैन होज़े से करीब 160 किलोमीटर दूर पोआंइट रियज़ नामक जगह पर जाएंगे। यह एक राष्ट्रीय पार्क है व वहां एक बहुत ही सुंदर लाइटहाउस भी है।

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कंस्लटिंग के चलते बहुत सी कम्पनियों में काम करने को मिलता है। बहुत से लोगों का काम करने के वातावरण को देखने, उसमें घुलने मिलने को भी मिलता है। इसे ग्लोबलाईजेशन की दुर्घटना कहें या कुछ और लगभग सभी कम्पनियों में कम्पयूटर स्टाफ में अपने देसी भाई यानि भारतीय भी खूब मिलते हैं। भारतीय होने के अलावा एक और बात जो लगभग सभी जगह देसीभाईयों में एकरस देखने को मिलती है कि अपन लोग समय की कदर बहुत कम करते हैं। मीटिंग मे बहुधा लेट पहुंचते हैं और यदि मीटिंग सुबह के 8 बजे हुई तो समझ लो बज गई घंटी।

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कहते हैं समय बड़ा बलवान, पर भाई मेरे ख्याल से अमरीकी समय से भी बलवान हैं। हर साल दो बार समय बदल देते हैं। मेरा इशारा है “डे-लाइट सेविंग्स” की तरफ। अभी आज सुबह समय एक घंटा आगे हो गया यानि कि स्प्रिंग अहेड या फिर बसंत उछाल। बसंत के आते ही सूरज थोड़ा पहले उगना शुरु हो जाता है व ज्यादा देर तक रोशनी रहती है। समय एक घंटा आगे करने से आप पुराने समय के हिसाब से सात बजे उठेंगे जबकि समय होगा आठ। हाय राम एक घंटा कहां गया। देसी भाईयों को इससे बड़ी परेशानी होती है। एक भाई तो अपना समय ही ठीक नहीं करता।

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पूंजीवाद का सिद्धांत है कि यदि कोई किसी चीज के पैसा देता है तो वह चीज बाजार में आ जाएगी। यहाँ कैलिफोर्निया में सरकारी वाहन विभाग (DMV) जो कि आपके वाहनों का पंजीकरण व ड्राइविंग लाईसेंस वगैरह का काम करता है आप को अपनी कारों के लिए मनभावन लाइसेंस प्लेट नम्बर लेने देता है। जैसे कि मैं अपनी कार के लिए MRCHSTH ले सकता हूँ। अब यहाँ कैलिफोर्निया में अपुन लोग (देसी बंधू) खूब हैं तो बड़े मजेदार नम्बर देखने को मिलते हैं। कुछ उदाहरण नीचे हैं

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शनिवार की सुबह है, और पहली खबर न्यूयार्क टाइम्स में पढ़ी की बम्बई के मशहूर डिब्बे वालों की जैसी लंच वितरण सेवा अब आमछी वैली में भी शुरु हो गई है। खबर के हिसाब से यह २००२ से चल रही है पर मुझे अभी ही पता चला। शुरु करने वाली हैं कविता श्रीवथसन। मजे की बात है जब वे यहाँ आई थी तो खाना बनाना भी नहीं जानती थी और अब पंजाबियों को उनका साग पनीर, गुजरातियों की दाल रोटी, और दक्षिण वालों के लिए रासम इन्हीं के अन्नदाता.

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बाहर रहते हुए कभी कभी कुछ विचार आते हैं जो कि मन को सालते हैं । व्यक्तिगत स्तर पर घर संबधियों की चिंता, क्या मैं एक अच्छा भाई, बेटा साबित हो रहा हूँ इत्यादि। इस स्तर से उठते हुए राष्ट्रीय स्तर पर यहां रहते हुए मैं देश के लिए क्या कर रहा हूँ। खासकर जब आप जानते हैं कि आप आज जहाँ है वहां आप शिक्षा की वजह से ही हैं। शिक्षा के लिए तो देश का ऋणी ताजिंदगी रहना पड़ेगा। खासकर अतानू डे का हू एक्चुली पेड फॉर माई ऐजूकेशन(आखिर मेरी पढ़ाई के पैसे किसने दिए) पढ़ने के बाद। इस विचारावस्था से निकलने के दो उपाय जो हमेशा सोचता हूँ वे इस प्रकार हैं

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पंकज नरूला

A Product Guy working in Cloud in particular SAP HANA Cloud Platform playing with Cloud Foundry + Subscription and Usage billing models

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