सिलिकन वैली का ट्रैफ़िक काफ़ी ख़राब है। बीस मील का आफ़िस का रास्ता जो आधे घंटे में होना चाहिए घंटे सवा में ही हो पाता है। कुछ समय तक तो रेडियो सुन कर बिताया पर फिर उस से भी पक गए। तो फिर एक नया शग़ल निकाला। पाड्कॉस्ट सुनने का। मज़ेदार बात यह है की पाड्कॉस्ट वाले काफ़ी लोग पुराने चिट्ठाकार हैं। टाइलर कौवन ऐसे ही एक जग प्रसिद्ध चिट्ठाकार हैं जिनके पाड्कॉस्ट के बारें में पता चला। उन के दूसरे पाड्कॉस्ट में वह जेफ़री सैक्स नाम के अर्थशास्त्री को ले कर आए। उसी चर्चा में भारतीय हरित क्रांति की बात चली तो नई बात पता चली। भारतीय हरित क्रांति के मैक्सिको संबध के बारे में।

बड़े होते हुए स्कूल में हरित क्रांति के बारें में पढ़ते थे। उस समय जो रटाया जाता था बिना समझे दिमाग़ की डिस्क में रिकार्ड कर लेते थे। शायद तब भी बताया गया होगा लेकिन अभी पता लगा तो थोड़ा नया लगा। ६० के दशक में अमेरिका और यू एन ने मेक्सिको की मदद की थी व पहली हरित क्रांति मेक्सिको में ही आई थी। यहीं मेक्सिको के ही अनुभवो व तकनीकों को भारत ले कर जाया गया था। यहाँ से तीन फ़सलो गेहूँ, चावल व बाजरे के बीजों को भारत में लाया गया व गेहूँ का बीज हरियाणा व पंजाब में काफ़ी सफल रहा। यानी की अपन जो बचपन से रोटी खा रहे थे उस में कहीं कहीं मेक्सिको की आभा भी थी। तभी कहूँ यहाँ मेक्सिकन टोरतिया में घर जैसी बात क्यूँ लगती है।