मेरे दोस्त गुरु का तीन बजे फोन आया कि गुरु देखने चलना है क्या? हम लोग काफी दिन से इसके विज्ञापन देख रहे थे व देखने का मन बना चुके थे कि भाई इसके लिए दस डॉलर खरचने ही हैं। बिना समीक्षाएं पढ़े देखने गए गुरु को। यहाँ बे-एरिया के ट्रैफिक के वजह से १५ मिनट लेट पहुँचे।

पर गुरु से जितनी उम्मीदें थी उससे भी अच्छी निकली। गुरुकांत देसाई व सुजाता वाकई कमाल के किरदार बनाएं हैं। गुरु जिसने न सुनना नहीं सीखा। धंधे की इतनी समझ की सारी दुनिया से अलग जा सकने की कुवत। दुनिया सूत खरीद रही है तो हम केला सिल्क बनाएंगे। बनिया बुद्धि ऐसी कि आवाज भी बचा कर खर्चते हैं। रास्ते में सरकार के दकियानूसी कानून व लाईसेंस भी आएं तो सरकार से भी पंगा ले सकने का साहस। वहीं सुजाता हर कदम पर पति के साथ। सुःख दुःख हर कदम पर साथ साथ। समझ इतनी कि अगर मायके वाले गलत जाएं तो उन्हें गलत कहना। 

एक अच्छी फिल्म बड़े पर्दे पर ही देखें।