मेरे एक परम मित्र हैं शादीशुदा हैं व आजकल काम के सिलसिले में चेन्नई गए हुए हैं। भाभी जी यहाँ हैं व वे वहाँ हैं। अब प्रिया बिना दिल नहीं लागे रे व विरहयोग में फिर से कवि बन बैठे हैं। देखिए उनकी लेखनी

चाँद को देख कर चाँद याद आता है क्या कहें
चाँद को छू लेने को जी चाहता है क्या कहें
तारे तो बहुत हैं पर चाँद तो एक ही है
चाँदनी में डूब जाने को
जी चाहता है क्या कहें

हमारा चाँद भी पास होता तो बात थी
बहुत दूर है हमसे अभी क्या कहें
तन्हा बैठे चाँद निहारते हैं क्या कहें
इस चाँद में भी वही
चाँद नजर आता है क्या कहें

चाँद की मस्ती की बात करता है चकोर
चकोर बन जाने को जी चाहता है क्या कहें
आप रात में ही चाँद देखते होंगे
हमें तो दिन में
भी नजर आता है चांद क्या कहें

चाँद के पास भी तपिश तो होती है
उस तपिश के लिये भी जी ललचाता है क्या कहें
तपिश ऐसी जो जला दे सब कुछ
उसी तपिश में जल
जाने को जी चाहता है क्या कहें

चाँद में भी दाग ढ़ूढ़ लेते हैं लोग
हमें तो नजर नहीं आता है क्या कहें
दाग तो हम में भी एक हजार होंगे
हमारा चाँद कभी
नहीं जताता क्या कहें

चाँद तो बेदाग है दाग हम हैं
चाँद को टीका लगाने को जी चाहता है क्या कहें
तुम पर लगे इस टीके की कसम ऐ चाँद
किसी की नजर न लगने
देंगे तुम्हें

जब मेरे मित्र वापिस आएंगे तो उन्हें हवाई अड्डे पर लेने मुझे ही जाना है। उनके अनुसार यदि कविता न भी अच्छी लगे तो एयरपोर्ट पर जरुर लेने पहुँच जाऊं फिर कभी नहीं लिखेंगे। आप क्या कहते हैं लेने जाऊं कि नहीं…