अनुगूँज

अभी कुछ समय पहले एक ब्लॉग प्रविष्टि पढ़ी, बड़ी रोचक लगी। इस पर खूब मनन भी किया, हर चिट्ठाकार की तरह मन में विचार आया कि मौका लगते ही इस पर एक प्रविष्टि पेल दूँगा। अभी इस विचार को मन में घूमते हूए कुछ समय ही हुआ था कि राजेश जी सुमात्रा वालों ने अनुगूँज तेहरवीं की घोषणा कर दी। पढ़ी गई प्रविष्टि का तात्पर्य था कि हम अपने शरीर की बेहतरी के लिए तो नाना प्रकार के व्यायाम करते हैं, करते हैं न, पर मन की बेहतरी के लिए कुछ भी नहीं करते। हर तरफ से जो इनपुट आ रही है बस लिए जा रहे हैं। कभी प्रयास नहीं करते की कुछ अच्छा जाए दिमाग में। तो मन के बेहतरी के लिए क्या – सत्संग। यानि अच्छे लोगों का साथ। उनके विचारों का आत्मसात। यही सत्संग विषय है इस अनुगूँज का।

इस बात में तो कोई दो राय नहीं कि सत्संग जरुरी है। सत्संग की महत्ता हमारे समाज में रची बसी है। शादी जो कि किसी भी समाज के अभिन्न अंग है के समय आर्थिक समन्वय के अलावा यह भी देखा जाता है कि कैसे लोगों की बीच उठना बैठना है। शोले का अमिताभ, धर्मेन्द्र का कोई भी अवगुण न मानकर सारी बात दोस्तों के संग पर ही डाल देता है। बचपन से माँ बाप इस बात पर बहुत ध्यान देते हैं के बच्चे किस किस के साथ घूम रहे हैं। माँ की बचपन में कही गई एक बात अब भी याद है और वेगास जाते वक्त अब भी याद कर लेते हैं – “विक्की कौडियाँ नाल खेडदे खेडदे मोहरां नाल वी खेलनां आपे शुरु कर देंदे नें”। विक्की मेरे घर का नाम है और माँ कह रही है कि बेटा जिन दोस्तों के साथ आज तुम कौड़ियों से जूआ खेल रहे हो कल उन्हीं के साथ पैसे से भी खेलना शुरु कर दोगो। कुसंग की गति ऐसी ही है। लास वेगास की बात शुरु हुई है तो एक और बात बताता हूँ। इतने बड़े स्केल पर जूआ, शराब, शबाब होते देखकर अच्छे अच्छे पशोपश में पड़ जाते हैं कि यार इतने लोग कर रहें हैं तो इसमें क्या बुराई है। अपन भी कर के देखते हैं। सिग्रेट पीने वाले तो इस बात के गवाह हैं कि सिग्रेट संगति से ही आरम्भ होती है।

यहीं पर बुराई और अच्छाई पर एक बात कहना चाहुँगा कि बुराई हमेंशा अच्छी लगती है, अपनी तरफ बुलाती है, अपने से चिपका कर रखना चाहती है। जबकि अच्छाई का रास्ता तो कंटकपथ है। याद कीजिए जिंदगी में कितनी बार आप दौराहे पर खड़े हुए हैं और आप ने कौन सा रास्ता अख्तियार किया। यहाँ याद आती है अल पचीनो की सेंट ऑफ अ वुमेन। फिल्म के अंत में अंधा लेफ्टीनेंट कर्नल फ्रैंक स्लेड(पचीनो) स्कूल कमेटी के सामने अपने नौजवान साथी चार्ली की सत्यता व अच्छाई बुराई के बारे में कहता है

मैं जिंदगी में बहुत बार दौराहों पर आया हूँ। मुझे हमेंशा पता था कि सही रास्ता क्या है। मुझे पता था, बिना किसी शक के, लेकिन मैंने कभी भी सही रास्ता नहीं चुना। जानना चाहते हैं क्यूँ? सही रास्ता बहुत ही मुश्किल था। और यहाँ चार्ली को देखिए। वह भी दौराहे पर खड़ा है। उसने भी रास्ता चुना है। यह रास्ता सच व सच्चाई का है। यही रास्ता उसूलों का है जिससे कि आदमी का चरित्र बनता है।

(अनुवाद की गलतियाँ मेरी, मूल यहाँ देखिए।)

तो यह तो स्थापित है कि सत्संग श्रेयस्कर है और सत्संग आसानी से नहीं मिलता उसके लिए मेहनत करनी पड़ती है। पर क्या सिर्फ सत्संग काफी है? बिल्कुल नहीं। मनसा वाचा कर्मणा यानि मन, वाणी व कर्म तीनों का सदूपयोग ही समाज का भला कर सकता है। मैं कितना भी उपदेश दे दूँ पर यदि खुद कर्म से उस का पालन नहीं करता यानि आचरण में नहीं है तो भूल जाओ कोई और या मेरे बच्चे वैसा करेंगे। थोड़े दिन पहले ही किसी ने कहा था आज कल माँ बाप स्वयं टीवी से जुड़े रहते हैं फिर कहते हैं कि बच्चे खेलते नहीं इस उमर में खेलना जरुरी है। अरे भाई बच्चों का जैसा संग होगा वैसा ही करेंगे न। लाला दुकान पर बैठा कितने भी घोटाले करता रहे, पर मंदिर में जाकर दान देने से या यह कहने से कि भूल चूक माफ करना, मुक्त नहीं हो सकता। धंधा है पर गंदा है कह कर अपनी कमजोरी को छुपाना गलत है। सत्संग ही काफी नहीं उसे आचरण में भी लाना पड़ेगा। श्री राम जी का उदाहरण आचरण के संदर्भ में उत्तम है। मनसा वाचा कर्मणा। कंटकपथ पर अडिग। बस ऐसे ही।