इस बात में तो कोई दो राय नहीं कि शिक्षा हमेंशा से महत्वपूर्ण रही है। देखा जाए तो शायद शिक्षा आदि काल से ही मनुष्य के लिए आवश्यक रही होगी। सोचिए इस आदि मानव की जिसने पहली बार अग्नि देव प्रसन्न किए होंगे। इस अद्भुत शिक्षा से उसे कितने आनंद की प्राप्ति हुई होगी। फिर आगे चल कर अपनी भारतीय संस्कृति में तो इस विषय पर सैंकड़ों श्रुतियाँ-श्लोक कहे गए हैं। पर कल और आज में शिक्षा के महत्व में कुछ परिवर्तन आया है या अभी भी इसका महत्व उतना ही है जितना कल था।

शिक्षा के मायने विभिन्न व्यक्तियों के लिए विभिन्न होते हैं। ज्यादातर तो इसे आजिविका का साधन ही माना जाता है। पर अगर ऐसा है तो क्या माना जाए कि अमीर माँ बाप या फिर आज के भारत के नेता की औलादों को शिक्षा की आवश्यकता नहींं है। पर ऐसा नहीं है क्योंकि अगर औलाद नालायक है तो बड़े से बड़े कारूं का खजाना खत्म हो सकता है। यहाँ से हमें इस महत्व की पहली झलक मिलती है कि शिक्षा का मायना आर्थिक तो कतई नहींं है। समाज में उठना बैठना, शिष्टाचार भी इसी शिक्षा का भाग माने जाते है। तो क्या मानें कि केवल फोकी शिष्टता से हम अपना जीवन काट सकते हैं? और चलिए मान लिया कि आदमी के पास पैसा बनाने का साधन भी है और माँ बाप ने अच्छा संस्कार भी दिए हैं पर फिर भी व्यक्ति चिंता बहुत करता है कि कल क्या होगा या फिर किसी भी बात और बात पर घुनता रहता है। तो लगता है कि शिक्षा को संतोष भी सिखाना चाहिए।

अभी कुछ दिन अहले अतानू दा सिदार्थ नामक उपन्यास के बौद्ध भिक्षुक की कहानी सुना रहे थे कि कोई इस भिक्षुक से पुछता है कि उसने अब तक क्या सीखा है। इस पर भिक्षुक उत्तर देता है कि उस की सारी शिक्षा में उसने केवल तीन हही चीजे सीखी हीं सोचना, इंतजार करना, व व्रत करना। अहा क्या विचार हैं। कितने सरल शब्दों में मेरी पहले कही गई सारी बातें कह दी। अगर मैं सोच सकता हूँ तो धनोपार्जन, इज्जत सब मेरे पास होंगे। इंतजार करना पाना भी बड़ा बात है। एक रस होकर किसी काम को करना व आराम से उस के फल की प्राप्ति ही कहा था न अर्जुन से कृष्ण नें। व्रत करने की प्रवृत्ति, अनुशासन और दुनिया में कम से कम वस्तुओ पर भी गुजारा कर लेने की क्षमता बताती है।

तो बस यही है शिक्षा का अभिप्राय कल भी और आज भी।

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