मैं जानता हूँ कि गाँव वालो कि निगाह बहुत पैनी है, इसलिए जब मैंने मिर्ची सेठ का उपनाम प्रयोग किया तो जान गए कि कौन है। पता नहीं पहले ये बात कही है कि नहीं, पर हम लोगों का खानदानी धन्धा मिर्ची बेचने का है। जब दादा जी पूर्वी पंजाब और अबके पाकिस्तान में थे तो गधों पर मिर्ची लाद कर स्पलाई करते थे अब काम बड़े भईया और चचेरे भाई देखते हैं तो मिर्ची ट्रकों पर आती है। सभी भाईयों में मैं ही निक्कमा हूँ जो गौदाम में जाकर छींक मार देता है और एक बोरी तोलने में 15 मिनट लगाता है।

इस बार जब देस गया था तो भैया से हाँ भाई की बात भी हुई तो उन्होंने कही कि भाई इसका नाम तो हाँ भाई नहीं मिर्ची सेठ होना चाहिए था, एक बार तो हम पूरा का पूरा चिट्ठा इसी नाम से बना भी दिए बैनर तक बना दिए थे

मिर्ची सेठ

पर फिर हाँ भाई सभी जान गए हैं इसलिए अब मिर्ची सेठ कहीं कहीं ही उभरता है।