कभी कभी कुछ ऐसा पढ़ता हूँ जिसे सहेज कर रखने का मन करता है। पहले किसी आस पास के पन्ने पर लिख लेता था जो थोड़े दिनों में खो जाता था। लेकिन इ जो ब्लॉगवा है बढ़िया चीज़ है। विजय जी ने बिस्तर में तुलसी जी की यह पंक्ति लिखी और मैंने यहाँ सहेज ली

डासत ही गयी बीति निशा सब, कबहुँ न नाथ नींद भर सोयो

तुलसीदास

कुछ यही भाव किसी मुम्बई की बहुत पुरानी फिल्म के गीत के थे

“पूछो न कैसे मैंने रैन बिताई”