जब छ़ड़े (single) थे तो छड़े होने में मजा था। मेरे एक जीजा कहते थे कि “विक्की व्याह करा ले बड़े मजे हैं। नहा के आओ कच्छा बनैन त्यार मिलदे नें”। खैर शादी तो सब की होती है हम भी किए। पर दो हफ्तो से मेरी श्री जी घर से दूर हैं। अब शादीशुदा होके छड़ा होना बुरा तो नहीं है पर दुनिया वालों की नजरें बदल गई हैं। किसी अजनबी से मिलो तो बातचीत के सिलसिले में हो ही जाता है कि पूछ लेते हैं यू एस में कितने समय से हो। अब जवाब दो कि छह साल से तो अगला प्रश्न होता है कि अकेले ही हो अब तक। अब आदमी फट्टा लगाके तो घूम नहीं सकता कि भाई मेरी शादी हो चुकी है। साथ ही जवाब की प्रतिक्रिया सामने वाले के शादीशुदा या गैर शादीशुदा होने पर निर्भर होती है। यदि तो सामने वाला भी छड़ा हुआ तो जवाब होता है “फिर आज कल तो मजे हैं, आजादी की जिंदगी” जैसे बीवी न हूई हंटर वाली हो गई और यदि सामने वाला शादीशुदा हूआ तो प्रतिक्रिया होती है “फिर आज कल तो बड़ी मुश्किल होती होगी, सब ठीक चल रहा हैं न” जैसे हम ने तो माँ बाप से दूर होते ही शादी करली थी।

सबसे मजा आता है कि जबर-छड़ा की औकात कम हो जाती है। जगजीत सिंह ने अपने एक पंजाबी गाने में कहा है

“जे किसे छड़े दी माँ मर जावे,

कल्ला बैठा शोक मनावे।

ते महल्ले दी कोई जनानी,

डर दे मारे औहदे घर पिट्टण न आवे।”

तो शादीशुदा छड़ों से लोगों को यह डर भी खत्म हो जाता है। पर जाते जाते सही कहें

रह[*] के तुझ बिन इस तरह,

ऐ दोस्त घबराता हूँ मैं।

जैसे हर शै में

किसी शै की कमी पाता हूँ मैं।

[*] असली शेर में रह की जगह आके है व यह जगजीत सिंह की गाई कहकशां एलबम से है