सीधे सीधे अनुनाद जी के प्रतिभास के फुटर से टोपो मार रहा हूँ। पर यह श्लोक है ही इतना अच्छा और मेरे कंस्लटिंग के धंधे के लिए उपयुक्त की रहा न गया।

अमंत्रं अक्षरं नास्ति , नास्ति मूलं अनौषधं ।

अयोग्यः पुरुषः नास्ति, योजकः तत्र दुर्लभ: ॥

कोई अक्षर ऐसा नही है जिससे (कोई) मन्त्र न शुरु होता हो , कोई ऐसा मूल (जड़) नही है , जिससे कोई औषधि न बनती हो और कोई भी आदमी अयोग्य नही होता , उसको काम मे लेने वाले (मैनेजर) ही दुर्लभ हैं ।