एक बात जो कि हिन्दू होने के नाते बचपन से आपके दिमाग में बैठाई जाती है वह है कि सभी धर्म समान हैं और एक ही जगह पहुँचने के अलग अलग रास्ते है। बड़ा ही अच्छा विचार है और एक अच्छे बालक होते हुए हम इसे अपनी जिंदगी में आत्मसात भी कर लेते हैं। मैं ने भी इस से आगे कुछ नहीं सोचा। लेकिन कुछ समय पहले डा. फ्रैंक गायतेनो मोरेल्स का लेख Does Hinduism Teach That All Religions Are The Same? पढ़ा, तो सोचने पर मजबूर हो गया। एक बात जो कि खासकर ध्यान देने वाली थी -

एक बंदा है जिसे कि उसका धर्म सिखाता है कि भईया मूर्ति में ही भगवान है। एक दूसरा बंदा जिसे कि उसका धर्म सिखाता है कि या तो दुनिया में उसके धर्म को मानने वाले हैं या फिर दूसरे जो किसी और चीज़ को मानते हैं। तो इस दूसरे वर्ग वालों को या तो अपनी बात मानने के लिए मजबूर करो या फिर इस दुनिया से मिटा दो। तो एक दिन पहले धर्म वाला अपनी पूजा कर रहा होता है और दूर से दूसरे धर्म वाला आता है और देखता है कि यह तो उसके धर्म के हिसाब से गलत हो रहा है वह आता है और इस मूर्ति पुजक को मार देता है। अब दोनों व्यक्ति अपने अपने धर्म को मान रहे थे पर इस वजह से पहला व्यक्ति मृत है और दूसरा खुशी खुशी अपनी राह पर है कि चलो आज एक धर्म का काम किया।

यह सोचते हुए दोनों धर्म एक समान कैसे हो सकते हैं। एक और थी कि यह बात कि “सभी धर्म समान हैं” अपने आप में ही गलत है वो ऐसे कि यदि हिन्दू धर्म सोचता है कि सभी धर्म समान हैं और बाकी यह सोचते हैं कि सिर्फ वही महान हैं। तो क्यूंकि समानता कि बात सिर्फ हिन्दू धर्म करता है, तो वह अपने को दूसरों से ऊपर मानता है। तो उसका अपना यह सोचना कि सभी समान है गलत हो जाता है। बाकी का आप ऊपर लेख की कड़ी से ही पढें।

जाते जाते एक और बात अपने यहाँ धर्म के ऊपर चिंतन बहुत ही कम होता है। कोई धर्म की बात करे तो उसे संघी या फिर पिछड़ा हुआ कह कर दुत्कार दिया जाता है। मेरा सोचना है कि धर्म इत्यादि की भी अपनी कक्षाएं होनी चाहिए जहाँ आप दर्शनशास्त्र की तरह इस पर भी खुली चर्चा कर सकें। जीवन, मृत्यू, शादी ब्याह पर इतनी रीतियाँ होती हैं बस इक क्रम में करते जाते हैं बिना सोचे कि इसका मतलब क्या है। अभी एक मित्र अपनी इच्छा से कोर्ट में शादी कर रहे हैं फिर वर वधु पक्ष अपनी अपनी तरफ प्रीतिभोज रखेंगे। पहले तो हमने भी खूब गालियाँ पिलाई पर अब सोचते हैं कि उसकी शादी है जैसा उसे लगे वैसा ही करना चाहिए। एक और बात इन्ही सब बातों पर एक और लेखक जो अलग सोचने की बात रखते हैं वह हैं राजीव मल्होत्रा। देखिए वह क्या कहते हैं।