अरे शीर्षक पर मत जाइए। ऐसा वास्तव में नहीं हुआ है। अपितु मेरी श्रीमती जी का यही मानना है। पर अपनी एवं मित्रों की बीवियों को देखकर लगता यही है कि शादी के कुछ समय बाद सभी बालाएं यही सोचती हैं कि उनके मिंया तो ऐंवें ही हैं। चलो छोड़ो इस बात को ये तो घर घर की कहानी है। आते हैं मुद्दे की बात पर।

जब हिन्दी चिट्ठाकारिता शुरू की तो बड़ी सारी चीज़ों का भान हुआ। कई बार तो इतनी आत्मग्लानि हुई की दिल किया चुल्लू भर पानी में डूब मरूं। बात ये है कि खिचड़ी हिन्दी बोलते-बोलते और यहाँ परदेस में आके कव दिमाग की कोशिकाओं में परिवर्तन हो गया पता ही न चला। जब जब हिन्दी लिखने बैठा पाया कि पहले विचार अंग्रेजी में आते हैं फिर उनका अनुवाद हिन्दी में होता है। बेड़ागर्क हो लार्ड मैकाले का। हाँ हाँ पता है अंग्रेजी आने की वजह से ही रोजी रोटी चल रही है। पर आदमी के बच्चे को गुस्सा भी तो आ सकता है। हद हो गई अपनी माँ बोली ही भूल गए। पर अब ठीक है थोड़े दिन के अभ्यास के बाद हनुमान जी की तरह जो शक्ति मैं होते हुए भी भूल गया था वापिस आ गई है।

क्या आप के साथ कभी ऐसा हुआ है?