कुछ समय पहले जीतेन्द्र जी ने एक प्रविष्टि लिखी थी जिसमें आप्रवासी भारतीयों की तुलना कुछ कुछ पेड़ से टूटे पत्ते से की थी कि आप्रवासी भारतीय पेड़ से टूटे पत्ते की तरह पेड़ से वापिस जुड़ नही सकते।

हम उस डाल के पन्क्षी है जो चाह कर भी वापस अपने ठिकाने पर नही पहुँच सकते या दूसरी तरह से कहे तो हम पेड़ से गिरे पत्ते की तरह है जिसे हवा अपने साथ उड़ाकर दूसरे चमन मे ले गयी है,हमे भले ही अच्छे फूलो की सुगन्ध मिली हो, या नये पंक्षियो का साथ, लेकिन है तो हम पेड़ से गिरे हुए पत्ते ही, जो वापस अपने पेड़ से नही जुड़ सकता.

बात बहुत हद तक सही है और अधिसंख्य उदाहरण भी इसी चीज के हैं। पर फिर भी कहीं इस उपमा से कुछ टीस सी उठती थी कि कंहीं मैं भी टूटे पत्ते की तरह अपने बाग से बिछड़ा यहीं पड़ा पड़ा सूख न जाऊं। मानता हूँ कि गर ऐसा हुआ तो मेरे अपने स्वार्थ ही इस का कारण होंगे। पर अभी तो उमंगें जवां हैं कि हो न हो वापिस तो जाना ही है।

अभी एक दो हफ्ते पहले ब्रिज जी से मुलाकात हुई। वे भी सिली वैली के बाशिंदे हैं। तो बात चल निकली कि कौन कहां कितना समय रहा है। तो मैंने अपने बारे में बताया कि वैसे तो काम के सिलसिले में पूरा अमरीका ही भ्रमण करते हैं कभी सैन डियेगो, कभी अटलांटा और कभी सिनसिनाटी। पर घर तो कैलीफोर्निया ही है। इसे छोड़ कर कहाँ जाएंगे। सभी दोस्त तो यहीं हैं। तिस पर ब्रिज जी ने जो तुलना की मानो मुझे मेरे शब्द मिल गए हों। वे बोले कि हाँ जहाज का पंछी कहाँ जाएगा घूम फिर कर वापिस जहाज पर ही आएगा। तो बधूंवर अभी तो चाह यही हैं कि भगवन इस जहाज के पंछी को भी वापिस जहाज पर जाना है…