अनुगूँज

भई वैसे तो पिछले [अनुगूँज

भई वैसे तो पिछले](http://hindi.pnarula.com/akshargram/2004/10/25/90/) की तिथि निकल चुकी है पर चिट्ठों की दुनिया का मजा ही ये है कि जब छपास पीड़ा हुई तुरंत निवारण कर लिया। तो नीरव जी ने जब पहले अनुगूँज का यह विषय रखा मन में बड़े विचार आए तो उन्हीं विचारों का ताना-बाना इस प्रविष्टि के तहत प्रस्तुत है। आशा है नीरव व देबाशीष देरी के लिए बुरा नहीं मानेंगे।

ये तो मैं मानता हुँ कि देह ही सब कुछ नहीं है। पर इस विचार तक पहुँचनें में, इसे समझने में जिस समझदारी की जरुरत है उस मानसिक स्तर तक पहुँचनें के लिए बड़ी मेहनत की जरुरत है। आजकल की भागम-भाग की जिंदगी में यह और भी मुश्किल है। पहले बच्चे जहाँ पंचतंत्र, जातक कथाएं व विवेकानंद पढ़ कर बड़े होते थे तो आज एम टी वी, जी टी वी, और स्टार टी वी देख कर बड़े होते हैं। तो इन सब माध्यमों का कुछ असर तो होगा ही। आज यदि स्कूल कॉलेज में आप का ब्वायफ्रेंड या गर्लफ्रेंड नहीं है तो आप पर दया दिखाई जाती है। अब यदि स्कूलों में ही विपरीत सेक्स को आकर्षित करने की होड़ लगेगी तो इसके लिए देह से अच्छा अस्त्र क्या है। देखा जाए तो यह सब सदियों से चलता आया है और चलता रहेगा। पर देखना होगा कि हर चीज को करने का एक वक्त होता है। मैं यह नहीं कह रहा कि पढ़ाई लिखाई के बाद आप सड़क पर नंगे हो कर चलना शुरु कर दें पर तब तक आप में इतनी समझ आ चुकी होगी आप कह सकेंगे की देह ही नहीं सब कुछ

यह सब लिखते लिखते एक ठौ बात दिमाग में आई – अधिकतर हम लोग कपड़े अपने आप को वातावरण से बचाने के लिए पहनते हैं। फर्ज कीजिए की एक ऐसी दुनिया है जहाँ न सर्दी है न गरमी न धूल है न बारिश। यदि आप नंगे भी रहें तो कोई फर्क नहीं। यानि की इस दुनिया में सभी नंगे ही रहते हैं। तो ऐसे समाज में देह क्या मायने रखेगी। यदि आप के पास दिखाने के लिए कुछ बचे ही न तो क्या करेंगे।