मैंने आमों की बात की और संजय जी ने अपने बचपन का मजेदार किस्सा सुनाया। आखिरी में उनकी बात “कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन” ने मेरे सोच के घोड़ों को तेजी से दौड़ा दिया। हम सभी कभी न कभी इस बात की कामना अवश्य करते हैं कि हाय किसी तरह से बचपन के दिन वापिस लौट आंए। माना कि बचपन के दिन बड़े मस्त होते हैं। पर ऐसा क्या है बचपन में जो जवानी या उस के बाद छूट जाता है। मेरा मानना है कि बचपन पड़ी ही बेफिक्री का दौर होता है किसी बात की चिंता नहीं। कुछ हो गया तो मम्मी पापा हैं देख लेंगे। जिंदगी में आगे क्या करना है, कैसी कैसी मुश्किलें हो सकती हैं, कोई परवाह नहीं। शायद इसी को अंग्रेजी में “Ignorance is bliss” कहते हैं।

पर देखा जाए बचपन के बाद की जिंदगी भी क्यूँ बुरी है? ज्यादा चीजें समझ में आने लगती हैं। आस पास क्या हो रहा है साफ साफ समझ में आने लगता है। किसी चीज पर कोई बंदिश नहीं होती जो जी में जब भी आए कर लो। आदमी ज्यादा माया के पचड़ों कि मेरी कार तेरी कार से बड़ी है में न पड़े तो क्या बुरी है ये जिंदगी। पर फिर भी आप हमेंशा सुनेगे “कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन”।