कॉलेज के जमाने में होस्टल की मैस में शनिवार को नाश्ते में मूली के पराँठे मिलते थे। उस समय दोस्तों से मजाक में कई बार इस बात पर मनन होता था कि यदि हम बहुत सारे पराँठे खा लें और इसके बाद जो होता है थोड़े थोड़े अंतराल पर होने की बजाए अगर एक […]

ऊपर वाली छवि है टाईम्स ऑफ इंडिया के पुराने सजाल की। यह पन्ना प्रथम पृष्ठ होता था, टाईम्स ऑफ इंडिया को पढ़ने छोड़ने के कारणों में से बहुत बड़ा कारण इनका यह थीम भी था। जब भी इसे देखता रक्तचाप बढ़ जाता, दिल धौकनी की तरह भागता। यदि आप अभी भी यह देखना चाहते हैं तो इस कड़ी पर क्लिकावें। 
खैर आज कल नव-सृजन की बातें होती हैं। टी ओ आई की […]

पिछली प्रविष्टि की मिली टिप्पणियों से लगता है कि मैं जो बात कहना चाहता था कहीं पैसे  और कम्पयूटर में डूब कर रह गई। गलती पूरी तरह से मेरी ही थी कि अपनी बात कहने के लिए कम्पयूटर इंडस्ट्री का सहारा लिया। राजीव भाई ने अपनी प्रतिक्रिया में माँग व पूर्ति तथा नव-सृजन हर जगह की बात की जिस मैं पूरी तरह से […]

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