जगजीत सिंह जी की एक गजल है – छड़यां दी जून बुरी – जोकी कुंवारो की जिंदगी ब्यान करती है। यू-टयूब पर फिर से सुनने का मौका मिला। पर गजल के शुरु का शेर इतना कत्ल था कि यहाँ लिख रहा हूं। संगीत मय सुनने के लिए यूटयूब है ही।
किसे वल ऑखिया मजनू नूं, ओए तेरी लैला दिसदी काली वे
मजनू मुड़ जवाब दित्ता ओ तेरी अक्ख न वेखण वाली ए
वेद वी चिट्टे ते कुरान वी चिट्टी विच श्याही रख दित्ती काली ए
गुलाम फरीद जित्थे अखियां लगियां ओथे की गोरी की काली वे
2 Responses
amit
April 27th, 2009 at 10:25 am
1सेठ जी, वीडियो का कोड सही से नहीं डला दिखता, चल नहीं रहा इधर!
Abhishek Pandey
May 20th, 2009 at 10:00 pm
2bahut hi accha
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