जगजीत सिंह जी की एक गजल है – छड़यां दी जून बुरी – जोकी कुंवारो की जिंदगी ब्यान करती है। यू-टयूब पर फिर से सुनने का मौका मिला। पर गजल के शुरु का शेर इतना कत्ल था कि यहाँ लिख रहा हूं। संगीत मय सुनने के लिए यूटयूब है ही।

किसे वल ऑखिया मजनू नूं, ओए तेरी लैला दिसदी काली वे
मजनू मुड़ जवाब दित्ता ओ तेरी अक्ख न वेखण वाली ए
वेद वी चिट्टे ते कुरान वी चिट्टी विच श्याही रख दित्ती काली ए
गुलाम फरीद जित्थे अखियां लगियां ओथे की गोरी की काली वे

छड़यां दी जून बुरी