सुबह जब बिस्तर से निकलने में मुश्किल हो, तो अपने आप से कहो “ मुझे एक आदमी की तरह, काम पर जाना है। यदि मैं वही करने जा रहा हूँ जिस के लिए मेरा जन्म हूआ है – और जिस के लिए मैं इस दुनिया में लाया गया था तो मैं कैसे शिकायत कर सकता हूँ ? या फिर मैं इसी के लिए जन्मा था ? कम्बल के नीचे घुस कर मस्ती से सोने के लिए ?

–पर यहाँ कितना अच्छा है….

अच्छा तो तुम “अच्छा” लगने के लिए पैदा हूए थे ? इसके लिए नहीं कि तुम काम करो और उन्हें अनुभव करो ? तुम्हें पौधे, चींटियां और मकड़ियां नजर नहीं दिखती, सभी उन्हें निहित काम कर रहे हैं, दुनिया को अपने अपने तरीके से सही कर रहे हैं ? और तुम आदमी के हिस्से में दिया गया काम करने के लिए राजी नहीं हो ? तुम अपनी शक्ति के हिसाब से काम करने के लिए तत्पर नहीं हो ?

– पर सोना भी तो जरुरी है…

माना । पर प्रकृति ने हर चीज की एक सीमा बाँधी है – खाने व पीने जैसे ही। और तुम अपनी सीमा पार कर चुके हो। तुम कुछ ज्यादा ही सो चुके हो। पर काम का ज्यादा नहीं हुआ। वहाँ तुम कोटे से कम ही हो।

तुम अपने से प्यार नहीं करते। ऐसा होता तो तुम अपनी प्रकृति व यह आप से जो चाहती है से भी प्यार करते। और जो लोग अपने काम से प्यार करते हैं वे काम करते थकते नहीं, यहाँ तक कि वे नहाना, धोना या खाना भी भूल जाते हैं। क्या तुम्हें अपनी शक्ति की इतनी भी कद्र नहीं जैसे कि एक शिल्पकार को अपने शिल्प पर, नृतक को नृत्य, कंजूस को पैसे या फिर समाज में रूतबा पसंद लोगो को रुतबे से होती है ? जब वे अपने काम में मग्न होते हैं तो वे खाना, पीना व सोना छोड़ कर अपने काम को करना ज्यादा पसंद करते हैं।