हिन्दी चिट्ठों की दुनिया छोटी सी है। पिछले तीन-चार सालों में दसियों से हजारों चिट्ठों के सफर में पहली सीटों पर बैठने का भी मौका मिला। देबू के चिट्ठा विश्व से शुरु हुए सफर में नारद ने हिन्दी ब्लॉगिंग के शुरुआती दौर में अपनी अलग जगह बनाई। पिछले कुछ महीनों में नए चिट्ठाजगत, ब्लॉगवाणी एग्रीगेटर आरंभ हुए व अब हिन्दी ब्लॉगपाठकों के पास नई प्रविष्टियाँ पढ़ने के लिए काफी उपाय हैं। विभिन्न एग्रीगेटरों के चलते गुणीजनों में यह विचार उठे थे कि इतने संकलकों की कोई जरुरत नहीं है। लेकिन यदि कल न्यूयार्क टाईम्स के पैसे देकर पढ़े जा सकने वाली सामग्री को फ्री करने के फैसले को देखें तो पाएंगे कि याहू, गूगल इत्यादि की तरह संकलक जरुरी हैं
What changed, The Times said, was that many more readers started coming to the site from search engines and links on other sites instead of coming directly to NYTimes.com. These indirect readers, unable to get access to articles behind the pay wall and less likely to pay subscription fees than the more loyal direct users, were seen as opportunities for more page views and increased advertising revenue.
“What wasn’t anticipated was the explosion in how much of our traffic would be generated by Google, by Yahoo and some others,” Ms. Schiller said.
15 Responses
rachna
सितम्बर 18th, 2007 at 8:20 pm
1agrregators are needed still because they have compilation of hindi bloggers but with no time they will become redundent because the pupose should have been to promote hindi where as the purpose has become to promote hindi bloggers .
पंकज नरुला
सितम्बर 18th, 2007 at 8:50 pm
2रचना जी
आप कह रही हैं कि एग्रीगेटर - कुछेक हिन्दी ब्लॉगरों को प्रमोट कर रहे हैं मैं इस बात से सहमत नहीं हूँ। यदि ऐसा हो तो एग्रीगेटरों को सभी चिट्ठाकारों का लिखा हुआ न संकलित न करते हुए केवल अपने पसंदीदा चिट्ठाकारों की प्रविष्टियाँ ही दिखानी चाहिएं। जहाँ तक मैंने देखा है सभी संकलक बंधू अधिक से अधिक चिट्ठों को संकलित करते हैं। समयाभाव या अश्लील गालियों भरे कुछ चिट्ठों को जरुर छोड़ा गया हो सकता है।
कुछ उदाहरण देकर समझाएं तो बढ़िया।
rachna
सितम्बर 18th, 2007 at 9:03 pm
3see if you have to promote hindi you need not promote it with bringing up bloggers name profile who is on top who is on bottom . its not question of favouritism but hindi versus hind blogger promotion
i hope i am clear in my expression now
जीतू
सितम्बर 18th, 2007 at 9:40 pm
4रचना जी,
आप हिन्दी चिट्ठाकार है, लेकिन आपकी टिप्पणियां (अक्सर) अंग्रेजी मे ही क्यों आ रही है?
हिन्दी के प्रोत्साहन करने की बात आप कर रही है, लेकिन आपकी टिप्पणियां और बहस अंग्रेजी मे क्यों है?
मै एग्रीगेटर के मुद्दे पर आपके प्रश्नों के जवाब देना चाहूंगा, बशर्ते कि आप हिन्दी मे सवाल करें।
ज्ञानदत्त पाण्डेय
सितम्बर 18th, 2007 at 9:43 pm
5“लेकिन यदि कल न्यूयार्क टाईम्स के पैसे देकर पढ़े जा सकने वाली सामग्री को फ्री करने के फैसले को देखें …”
अरे वाह! क्या मस्त खबर दी है!
संजय बेंगाणी
सितम्बर 18th, 2007 at 10:57 pm
6तो सेठ की दुकान बन्द नहीं हुई है!!?
और रचनाजी मुझे अंग्रेजी तो आती नहीं, अनुमान लगा पाया हूँ की मामला लिख्खाड लोगो के ऊपर-नीचे होते ग्राफ को लेकर है, तो मैदान सब के लिए खुला है, खुब लिखो और ओपर रहो.
rachna
सितम्बर 18th, 2007 at 11:09 pm
7i am unable to post my comment getting duplicate error again and again
rachnasingh
सितम्बर 19th, 2007 at 12:18 am
8I have tried to post a comment many time but cant
rachnasingh
सितम्बर 19th, 2007 at 12:21 am
9और रचनाजी मुझे अंग्रेजी तो आती नहीं,
koi baat nahin merii tiparii itni mahatv puran nahin hae bhul jayae
राजीव
सितम्बर 19th, 2007 at 3:57 am
10हाँ, अवश्य ज़रूरी हैं। अन्य सुधारों के साथ वर्गीकरण भी आवश्यक हो गया है, पर संकलक क्या करें चिट्ठाकार ही अभी कई-कई मसलों पर लिखते हैं (अच्छी बात है, पर वर्गीकरण में शायद दिक्कत हो) पर अलग-अलग लेखों का तो वर्गीकरण संभव है चिप्पियों से, और हो भी रहा है। कुछ Tags (चिप्पियाँ) यदि मानक के रूप में स्थापित हो जावें तो श्रेणियों का नामकरण और संकलक का वर्गीकरण और भी उपयोगी हो जाये। विस्फ़ोट के अनुच्छेद 3 व 4 में भी आने वाले परिवर्तनों की संभावना दिखती है।
रचना जी की टि. सं 3 भी अति महत्वपूर्ण है, विचारणीय है।
संजय बेंगाणी
सितम्बर 19th, 2007 at 4:23 am
11मेर भी मामना था की वर्तमान में जितने चिट्ठे है और एग्रीगेटरों की आवश्यकता नहीं है. बाकी समय के साथ जरूरत के हिसाब से चीजे आती रहेंगी.
समीर लाल
सितम्बर 19th, 2007 at 8:26 am
12न्यूयार्क टाईम्स की खबर उत्साहवर्धक है.
mamta
सितम्बर 19th, 2007 at 9:18 am
13खबर तो वाकई अच्छी है।
neelima
सितम्बर 19th, 2007 at 9:47 pm
14आप यदि एग्रीगेटरों के महत्व पर और विस्तार से लिखें तो हमारा ज्ञानवर्धन हो
नीलिमा सुखीजा अरोड़ा
सितम्बर 26th, 2007 at 12:33 am
15आफ कोर्स बहुत जरूरी हैं, खासतौर पर मुझे जैसे नए चिट्ठाकारों के लिए पंकज, जिनके ब्लॉग के बारे में लोगों को अभी ज्यादा जानकारी नहीं है।
नोट-पंकज कैन यू हैल्प मी, मैं अभी हिन्दी आनलाइन टूल से लिख रही हूं जिससे स्पीड काफी कम हो जाती है। मैंने नारद से आफलाइन टूल डाउनलोड किया था पर य़े विंडोज एनटी मांग रहा है और मेरे कम्प्यूटर पर विंडोज 2000 है। क्या आपके पास कोई ऐसा टूलकिट है जिससे मैं नेट पर हिन्दी लिख सकूं।
मैं तकनीकी रूप से ज्यादा सॉलिड नहीं हूं तो कुछ ईजी प्रक्रिया ही बताइएगा।
मेरा ईमेल है- neelima.sukhija@gmail.com
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