आलोक भाई अभी अभी अमरीका से हो कर गए हैं, शायद यहाँ से कुछ खास चीज खाकर गए हैं ( समीर जी व जीतू भाई – अफसोस आलोक अपुन पियक्कड़ो जैसे नहीं हैं, नहीं तो लिखता खा-पीकर गए हैं)। इस लिए की जाते ही फटाक फटाक दो “बड़ी सी” प्रविष्टियां लिख डाली। बड़ी सी पर जोर इस लिए दे रहा हूँ कि आलोक अपनी कम लिखे को ज्यादा समझना – तार को खते समझना जैसी ब्लॉग पोस्टों के लिए बदनाम प्रसिद्ध हैं। खैर अगर ऐसी कोई बात है तो मैं आलोक से इस खाने वाली चीज के बारे में जरुर जानना चाहुंगा। श्रीमती जी कैमिस्ट्री की रिसर्च-स्नातक हैं उनसे कह कर इस चीज के अंदर के विटामिन निकलवाकर – बड़ी पोस्ट लिखने की गोली बना-बना कर बेचेंगे।
वैसे लिखना तो आलोक को पहले चाहिए था कि अमरीका उन्हें कैसा लगा। वैसा ही जैसा वे सोचते था या अलग। पर उन्होंने अपनी सोच की छिपकली सभी पर छोड़ दी अभी भाई लोग अनुगूंज में सोच सोच कर लिख रहे हैं। अब बड़े भाई ने कहा है तो लिखना तो पड़ेगा ही। तो लीजिए हमारी भी श्वेत-श्याम आहुति इस 22वीं अनुगूंज में।
श्वेत संस्करण
जे कर अपणा भारत अमरीका बण जावे ते भाई घणा मजा आवे। सिस्टम काम करने लगेगा। बाबू भाई दफ्तर वाले बिना रिश्वत लिए ठीक टाइम पर बिना भाव खाए काम करने लगेगें। लोग बाग अपने शहर को अपना शहर समझने लगेंगे। कूड़ा कूड़े दानों में ही फैंकेगे व बस, रेलगाड़ी, राशन की दुकानों में आराम से बिना भगदड़ मजाए लाइन से लगेंगे। शहरों में सुंदर सुंदर पार्क होंगे व किताबों से भरी सार्वजनिक लाइब्रेरियां होंगी। नलों में हर समय पानी आएगा व बिजली साल छमाही में एक बार बता कर जाएगी। सड़के, गली के बल्ब एक निश्चित समय पर मरम्मत कीए जाएंगे न कि जब तक चल रहे हैं चलने दो जब टूट जाएंगे तो ठीक करेंगे। अदालते समय रहते काम करेंगी व सरकार लोगों की जिंदगी में थोड़ा कम दखल देगी। लाइसेंस राज और ज्यादा काबू में किया जाएगा। सरकार के खर्चे पारदर्शी होंगे।
श्याम संस्करण
भाई जे कर भारत ना अमरीका बण गयो – घणो मुसीबत आ जावे। डाक्टर पर जाणे से पहले लोग सो बार सोचें। ये नहीं कि जब मन किया चले गए। डाक्टर के पास जाने के बाद इंश्योरस वालों से लड़ें कि ये खर्चा कवर नहीं किया मैं इसके पैसे क्यूं दूं जब इंश्योरंस का प्रीमियम देता हूँ। बाप बेटे के बड़े होने पर सोचे की यार ये बाहर क्यूं नहीं जाता और घर पर रह रहा है तो किराया देना शुरु करे। पार्टी में जाएं तो आप का दोस्त अपने परिवार से कुछ इस तरह मिलवाए – यह है मेरी तीसरी बीवी, ये बिल्लू पिंकी मेरे बच्चे है, घसीटा मेरी बीवी का सुपुत्र है व ये टिनटिन हमदोनों की बेटी है। आदमी उमर के तकाज़े भूलने लगे – सात साल का बच्चा साठ साल के आदमी को नाम से पुकारे, साठ साल की आंटी टम्मी टक व ब्रेस्ट आग्यूमेंट कराकर कल्बों में प्राउल पर निकले। पूरे देश में सामान खरीदने की गिन 30-40 तरह की दुकाने होंगी। जहाँ जाइए हर जगह आप को टारगेट, कोल्स, बेस्ट बॉय, सर्किट सिटी, वालमार्ट मिल जाएगा। कोई विविधता नहीँ। मदरास की साड़िया, मथुरा के पेड़े, पंजाब का साग व गुजरात का खाकरा क्या होता है भाई।
आज के लिए इतना ही।
7 Responses
Amit
August 4th, 2007 at 11:48 am
1खूब, बहुत सही, बिन्दुवार एक ही लीक पर न लिख दोनों पक्ष रखे।
समीर लाल
August 4th, 2007 at 2:10 pm
2यह सही रहा दोनों पक्षों को धरा गया. यही विविधता अनुगूँज को सार्थक बनाती है. बधाई.
अनूप शुक्ल
August 4th, 2007 at 5:21 pm
3दुनिया कलरफ़ुल हो रही है और सेठ जी श्वेत-श्याम! ऐसा क्यों भाई। लेकिन अच्छा लग रहे हैं।
श्रीश शर्मा
August 4th, 2007 at 7:37 pm
4श्वेत-श्याम तो मस्त रहा लेकिन अब रंगीन में भी लिखिए।
जीतू
August 4th, 2007 at 8:57 pm
5जे हुई ना बात!
हमे तो आपका ’श्याम संस्करण’ बहुत अच्छा लगा, जिसके चांसेस ज्यादा है, श्वेत संस्करण बनने मे सदियां लग जायेंगी।
आलोक
August 5th, 2007 at 8:26 pm
6बड़ी पोस्ट लिखने की गोली बना-बना कर बेचेंगे।
हाँ, और टेलीशॉपिङ्ग नेट्वर्क पर विज्ञापन देने के लिए फ़ुरसतिया और मोहल्ला को करारबद्ध कर लेना!
CAMERON
June 24th, 2010 at 11:56 am
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