आज घूमते घूमते बड़े ही काम के सजाल के बारे में पता चला। नाम है नेशन-मास्टर। यहाँ आप अलग अलग देशों के अलग अलग आंकड़ों के बारे जान सकते हो। निश्चित है कि मेरा पहला निशाना क्या होगा। तो लीजिए जनाब जरा नीचे की छवि पर निगाह डालिए व देखिए कि हम कहाँ कहाँ शाईन कर रहे हैं
यानि कि हमारे यहाँ सबसे ज्यादा पुलिस हैं - भई जनसंख्या दूसरे नम्बर की है तो ज्यादा मामू लोग भी चहिए होंगे न। समझते नहीं हैं। अब ज्यादा पुलिस वाले हैं तो पकड़े भी ज्यादा लोग जाएगें पर ये क्या पकड़े जाने के बाद छूटने वाले लोगों की भी संख्या सबसे ज्यादा है। अब यहाँ पर मेरा पहले वाला तर्क नहीं चलता कि लोग ज्यादा - पुलिस ज्यादा - इसी लिए छूटने वाले भी ज्यादा क्यूंकि अपने यहाँ इतने लोग पकड़े जाने के बाद अदालतों द्वारा छोड़े जाते हैं कि यदि अगले 48 देशों में छोड़े जाने वाले लोगों के नम्बरों को जोड़े तो भी हम लोग भारी पड़ते हैं। इसका क्या मतलब है
मुझे तो पता नहीं। पर घबराने की बात नहीं चाहे हमारे यहाँ मर्डर दुनिया में सबसे ज्यादा होते हैं (तीन गुनी जनसंख्या को देखते हुए यह नम्बर अमरीका के बराबर ही है) पर फिल्में भी तो हमीं लोग सबसे ज्यादा बनाते हैं भई कल्चर है। अखबार भी हमारे सबसे ज्यादा और पंगा नहीं लेना आर्मी वाले भी अपने सबसे ज्यादा हैं। आखिर में एक भंयकर बात अमरीका में 0.7 प्रतिशत जनसंख्या जेलों के अंदर है यानि 1000 में से 7 लोग अंदर हैं।
जाते जाते यदि आप ने मेरा पाप-पोल नहीं भरा तो एक बार यहाँ जाकर जरुर अपना कीमती वोट डालें - सिर्फ दो क्लिक का सवाल है। वोटिंग 27 वोटों पर जाकर रुक गई है। अरे यार पचास तो करो। वोटिंग एक अगस्त को बंद हो जाएगी।
10 Responses
ज्ञानदत्त पाण्डेय
जुलाई 29th, 2007 at 5:38 pm
1नेशन-मास्टर देख कर मैने भी कुछ डाटा खंगाल कर पोस्ट लिखने की सोची थी. फिर लगा कि आप जैसा कोई सज्जन उसी वेब साइट से कुछ और डाटा निकाल कर बिल्कुल उलट निष्कर्ष परोस सकता है. बस तभी रुक गया.
आपने सबको साइट के बारे में बताया - यह अच्छा रहा.
pankaj
जुलाई 29th, 2007 at 6:22 pm
2पाण्डेय जी,
आप बाकी क्या लिखेंगे न सोचकर लिख दिया कीजिए। अभी देखिए न नेशन मास्टर के बारे में आप से पहले ही पता चल जाता।
tarun
जुलाई 29th, 2007 at 7:45 pm
3cant read it pankaj now showing font properly in mycomputer
आलोक
जुलाई 30th, 2007 at 12:21 am
4वाह खुशी हुई कि इतनी सारी चीज़ों में हिन्दुस्तान पहले पाँच पर है, भले ही वह अच्छी बुरी - जो भी हों। अचरज की बात है कि इतने आँकड़े इकट्ठे कैसे किए? सरकारी दफ़्तरों से जानकारी लेने में तो बड़े बड़ों का तेल निकल जाता है।
संजय बेंगाणी
जुलाई 30th, 2007 at 1:41 am
5अच्छी आँकड़ेबाजी है. सही है.
वैसे भारत के आँकड़े निकालना कोई हँसी खेल नहीं. कोई बता सकता है, भारत की वास्तविक प्रति वयक्ति आय क्या है? सफेद से कई गुना तो काली कमाई है
रवि
जुलाई 30th, 2007 at 1:59 am
6बढ़िया आंकड़े दिखाए.
वैसे भारत में सरकारी आंकड़े कैसे बनते हैं - दन्न से ऊपर से आदेश आता है कि घंटे भर में कोई सौ पेज की जानकारी तत्काल भेजो नहीं तो हेड्स विल बी रोल्ड.
घंटे भर में तो फिर पिछले साल भेजी गई जानकारी ही जा सकती है - कवर लेटर को बदल कर!
अपना अनुभव बता रहा हूँ!
Amit
जुलाई 30th, 2007 at 2:37 am
7वाह सही है!!
समीर लाल
जुलाई 30th, 2007 at 6:54 am
8लगे रहें, बहुत सही तस्वीर उभर कर आ रही है इन आंकड़ों से.
श्रीश शर्मा
जुलाई 30th, 2007 at 7:08 am
9हम्म, बाकी तो पता नहीं लेकिन जरा चैक करना कि हम जनसँख्या में अभी चीन से कितने पीछे हैं। आखिर वहाँ तो हम कभी नंबर वन जरुर होंगे, पक्का भरोसा है।
Shastri JC Philip
अगस्त 3rd, 2007 at 11:07 pm
10प्रिय पंकज, यह बहुत काम की जानकारी दी आप ने. इस जालस्थल का उपयोग करूंगा. आभार — शास्त्री जे सी फिलिप
हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है
http://www.Sarathi.info
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