कंस्लटिंग के चलते बहुत सी कम्पनियों में काम करने को मिलता है। बहुत से लोगों का काम करने के वातावरण को देखने, उसमें घुलने मिलने को भी मिलता है। इसे ग्लोबलाईजेशन की दुर्घटना कहें या कुछ और लगभग सभी कम्पनियों में कम्पयूटर स्टाफ में अपने देसी भाई यानि भारतीय भी खूब मिलते हैं। भारतीय होने के अलावा एक और बात जो लगभग सभी जगह देसीभाईयों में एकरस देखने को मिलती है कि अपन लोग समय की कदर बहुत कम करते हैं। मीटिंग मे बहुधा लेट पहुंचते हैं और यदि मीटिंग सुबह के 8 बजे हुई तो समझ लो बज गई घंटी।
यह बात सिर्फ मीटिंग तक ही सीमित नहीं है। अपने सभी कार्यकर्म शादी-ब्याह पर पहुँचना, बच्चों की शिक्षक-अभिभावक मीटिंग, पिकनिक के लिए सुबह निकलना सब के सब एक आई एस टी यानि इंडियन स्टैंड्रड टाईम रोग से पीड़ित हैं। हालत यह है कि इसे अपने आचार विहार का अंग मान लिया गया है कि भैया हम तो ऐसे ही हैं। इंडियन स्टैंड्रड टाइम के हिसाब से 30 से 60 मिनट लेट ही पहुंचेगे। यह मैं अपने अमरीका में रहे पिछले 8-9 सालों के अपने व यहाँ देसी बिरादरी को देखते हुए लिख रहा हूँ। शायद देश में भी ऐसा ही हो। इस बारे में टिप्पणी में बताएं।
हम ऐसे कैसे हो यह मैं नहीं जानता पर शायद यह बिमारी नई ही है। अपने बड़े बूढ़ों को देखता हूँ तो सभी सुबह जल्दी उठने वाले व जल्दी सोने वालों में से हैं। अपनी नसल उल्टी है देर से सोती है व देर से उठती है। अब कौन सही है कौन गलत यह तो दर्शन का विषय है पर यह बात पक्की है कि समय की कद्र करनी चाहिए खासकर ऐसी जगहों पर जहाँ आप बहुत से देशों के लोगों के साथ काम कर रहे हों क्यूंकि आपसे आप के देश की पहचान होती है और आप यह तो न चाहेंगे कि मनुपुत्र जिनके बारे में दिनकर जी ने निम्न कविता लिखी थी दुनिया में आलसी लेटलतीफ के नाम से प्रसिद्ध हो
मनु नहीं, मनु-पुत्र है यह सामने, जिसकी
कल्पना की जीभ में भी धार होती है,
बाण ही होते विचारों के नहीं केवल,
स्वप्न के भी हाथ में तलवार होती है।
5 Responses
Tarun
अप्रैल 8th, 2007 at 2:54 pm
1हम फक्र करें या अफसोस कि हम इस बिमारी से ग्रस्त नही हैं, लेकिन आपका आंकलन १०० सही है।
नितिन व्यास
अप्रैल 8th, 2007 at 4:29 pm
2आपका आंकलन १००% सही है, मैंने यहां देसी भाईयों की टीम को सिर्फ देर से आने के कारण मिलियन डालर के प्रोजेक्ट से हाथ धोते भी देखा है, लेकिन शायद मानसिकता में ही कुछ समस्या है, मेरा एक मित्र
IST को Indian Stretchable Time कहता है
rachana
अप्रैल 8th, 2007 at 11:58 pm
3//शायद देश में भी ऐसा ही हो। इस बारे में टिप्पणी में बताएं।//
यहाँ भी बिल्कुल ऐसा ही है..पिछले दिनों अपनी बेटी को लेकर आँखों की डाक्टर साहिबा से मिलने गई थी..१० मि.बाद कहा गया कि मैडम १५ मि.मे आयेंगी फिर ३० मि.की प्रतिक्षा के बाद कहा गया कि आप कल आ जाइये..एक फोन नम्बर दिया गया जिस पर पूछ कर आने को कहा.. अगले दिन जब फोन करके वहाँ पहुँचे तो कुछ देर बाद प्रतिक्षा के बाद पूछा गया कि क्या हम आधा घंटा और् इन्तजार कर सकते हैं! मैडम को जरा देर हो सकती है…जब इस सब पर और हमारा इतना वक्त जाया करवाने पर आपत्ति दर्ज कराने उस बडे से अस्पताल के मालिक और डॉ साहिबा के पति महोदय ( जो खुद एक सर्जन हैं!)से मिलना चाहा तो मिलने नही दिया गया..अगली बार फिर कभी वहाँ न जाने की कसम खाकर वपस लौट आये..
..इतना सब यहाँ इसलिये लिख दिया कि, मेरी नाराज बेटी ने इस पर मुझसे एक पोस्ट लिखने को कहा था, जो अब तक नही लिख पाई थी..
आशीष
अप्रैल 9th, 2007 at 12:22 am
4देश मे स्थिती सुधर रही है, कम से कम आई टी क्षेत्र की कंपनीयों मे!
मैने कीसी मिटींग मे देर से आने वालो की संख्या मे लगातार कमी ही महसूस की है।
सुदीप साकल्ले
जून 16th, 2007 at 1:13 am
5अरे वाह , क्या पोइन्ट पकडा है यार , आप के आकलन दुनिया मै रह रहे ९५% भारतियो पर लागू होते है , मै भी उन से बाहर नही हु । यहा लन्दन मै भी यही हाल है
सुदीप साकल्ले (sudeep sakalle)
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