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	<title>Comments on: गांव और कैरियर</title>
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	<description>मिर्ची सी जिंदगी, कभी मंदी कभी तेज</description>
	<pubDate>Sun, 06 Jul 2008 06:35:29 +0000</pubDate>
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		<title>By: robin bhakhan</title>
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		<author>robin bhakhan</author>
		<pubDate>Mon, 04 Jun 2007 06:54:15 +0000</pubDate>
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		<description>the topic on the villages has been eloborated brilliantly and i think i need more attention of the policy makers......... and we, the people aslo need to take part in that.......

nice post and keep it up!!!!

visit me at :
www.numismatist4mindia.blogspot.com</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>the topic on the villages has been eloborated brilliantly and i think i need more attention of the policy makers&#8230;&#8230;&#8230; and we, the people aslo need to take part in that&#8230;&#8230;.</p>
<p>nice post and keep it up!!!!</p>
<p>visit me at :<br />
<a href="http://www.numismatist4mindia.blogspot.com" rel="nofollow">www.numismatist4mindia.blogspot.com</a></p>
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		<title>By: जीतू</title>
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		<author>जीतू</author>
		<pubDate>Sat, 14 Apr 2007 06:54:25 +0000</pubDate>
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		<description>अरे भई! सब बाजारवाद का खेल है। अभी देखना। 

जैसे शहरों के बाद, कस्बों के बाजारों पर बाजारवाद हावी हो रहा है, या कहो बाजार का विस्तार हो रहा है। ठीक उसी तरह गाँवो गाँवो तक ये क्रांति पहुँचेगी। भले ही शहरों मे बैठे पत्रकार, डाक्टर और अन्य पेशेवर वहाँ ना जाना चाहें लेकिन ये बाजार अपनी जरुरत के हिसाब से इलाज ढूंढ लेंगे। आवश्यकता अविष्कार की जननी है। गाँवों के ही नौजवान कमान सम्भालेंगे और बिलीब इट ओर नॉट, शहरों के पेशेवरों को कड़ी टक्कर देंगे। क्रांति तो अभी बस शुरु ही हुई है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अरे भई! सब बाजारवाद का खेल है। अभी देखना। </p>
<p>जैसे शहरों के बाद, कस्बों के बाजारों पर बाजारवाद हावी हो रहा है, या कहो बाजार का विस्तार हो रहा है। ठीक उसी तरह गाँवो गाँवो तक ये क्रांति पहुँचेगी। भले ही शहरों मे बैठे पत्रकार, डाक्टर और अन्य पेशेवर वहाँ ना जाना चाहें लेकिन ये बाजार अपनी जरुरत के हिसाब से इलाज ढूंढ लेंगे। आवश्यकता अविष्कार की जननी है। गाँवों के ही नौजवान कमान सम्भालेंगे और बिलीब इट ओर नॉट, शहरों के पेशेवरों को कड़ी टक्कर देंगे। क्रांति तो अभी बस शुरु ही हुई है।</p>
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		<title>By: kamal sharma</title>
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		<author>kamal sharma</author>
		<pubDate>Fri, 13 Apr 2007 17:40:13 +0000</pubDate>
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		<description>ग्रामीण पत्रकारिता को भारत में अब तक नजरअंदाज किया गया है लेकिन अब तो बड़ी बड़ी कंपनियों को भी समझ में आ गया है कि ग्रामीण बाजार की अनदेखी उन्‍हें भारी पड़ सकती है। हालांकि आपने यह सही कहा कि मीडिया वाले ग्रामीण क्षेत्रों में पत्रकारों की स्‍थाई नियुक्ति नहीं करते, जो इसे बढ़ावा देने में एक बड़ी परेशानी है। ग्रामीण क्षेत्रों में पारिश्रमिक भी कम दिया जाता है। यदि मीडिया समूह गांवों में स्‍थाई नियुक्ति, बेहतर वेतन और लेपटॉप जैसी दूसरी सुविधाएं देने लगे तो शहरों में कई पत्रकार आना ही पसंद नहीं करेंगे। मैं आपको मेरे बारे में ही बताता हूं कि यदि मुझे गांवों में ठीक पैसा मिलता तो मुंबई में पत्रकारिता करने नहीं आता। लेकिन क्‍या किया जा सकता। प्रिंट वाले अभी भी सेंटीमीटर के हिसाब से भुगतान करते हैं और फोन के खर्चे तक नहीं देते। इलेक्‍ट्रॉनिक माध्‍यम वाले प्रति स्‍टोरी पैसा देते हैं और वहां रोज रोज बड़ी वैसी स्‍टोरी होती नहीं जैसी मल्लिका शेरावत के मुंबई में नाचने पर बनती है। ठुमके गांवों में लगते नहीं, वहां कोई सेलिब्रिटी आकर खाना खाते नहीं और गांव वाले खा रहे हैं या भूखे हैं, इसकी स्‍टोरी कोई कवर करता नहीं। वेब पत्रकारिता का तो गांवों में कोई भविष्‍य नहीं है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>ग्रामीण पत्रकारिता को भारत में अब तक नजरअंदाज किया गया है लेकिन अब तो बड़ी बड़ी कंपनियों को भी समझ में आ गया है कि ग्रामीण बाजार की अनदेखी उन्‍हें भारी पड़ सकती है। हालांकि आपने यह सही कहा कि मीडिया वाले ग्रामीण क्षेत्रों में पत्रकारों की स्‍थाई नियुक्ति नहीं करते, जो इसे बढ़ावा देने में एक बड़ी परेशानी है। ग्रामीण क्षेत्रों में पारिश्रमिक भी कम दिया जाता है। यदि मीडिया समूह गांवों में स्‍थाई नियुक्ति, बेहतर वेतन और लेपटॉप जैसी दूसरी सुविधाएं देने लगे तो शहरों में कई पत्रकार आना ही पसंद नहीं करेंगे। मैं आपको मेरे बारे में ही बताता हूं कि यदि मुझे गांवों में ठीक पैसा मिलता तो मुंबई में पत्रकारिता करने नहीं आता। लेकिन क्‍या किया जा सकता। प्रिंट वाले अभी भी सेंटीमीटर के हिसाब से भुगतान करते हैं और फोन के खर्चे तक नहीं देते। इलेक्‍ट्रॉनिक माध्‍यम वाले प्रति स्‍टोरी पैसा देते हैं और वहां रोज रोज बड़ी वैसी स्‍टोरी होती नहीं जैसी मल्लिका शेरावत के मुंबई में नाचने पर बनती है। ठुमके गांवों में लगते नहीं, वहां कोई सेलिब्रिटी आकर खाना खाते नहीं और गांव वाले खा रहे हैं या भूखे हैं, इसकी स्‍टोरी कोई कवर करता नहीं। वेब पत्रकारिता का तो गांवों में कोई भविष्‍य नहीं है।</p>
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