आज मीडिया युग में सृजन शिल्पी जी का पत्रकारों के लिए संदेश पढ़ा -पत्रकारों, आओ अब गांवों की ओर लौटें ! पर अभी तक गांव उपेक्षित हैं के बारे में वे लिखते हैं
कैरियर की दृष्टि से कोई सुप्रशिक्षित पत्रकार ग्रामीण पत्रकारिता को अपनी विशेषज्ञता का क्षेत्र बनाने के लिए ग्रामीण इलाक़ों में लंबे समय तक कार्य करने के लिए तैयार नहीं होता।
यह बात केवल सुप्रशिक्षित पत्रकार पर ही लागू नहीं होती बल्कि डाक्टर, इंजीनियर, बैंकर, वकील इत्यादि सभी पर लागू होती है। यानि जो पढ़ लिख जाता है वह गांव से दूर होता जाता है। इसमें शिक्षा का कोई कसूर नहीं है बल्कि अर्थशास्त्र की बात है। शहर आकार व जनसंख्या में बड़े होने के नाते ऐसे बहुत सी सुविधाएं देते हैं जिनकी हर आदमी को दरकार होती है। जैसे अच्छे स्कूल, अस्पताल, पूलिस सुरुक्षा, मनोरंजन व सबसे बड़े नौकरी के अवसर। यह अधिकतर सुविधाएं सार्वजनिक हैं व इनकी उपस्थिति के लिए जरुरी है कि इनका प्रयोग काफी लोग करें ताकि इनके ऊपर जो खर्चा आता है वह ज्यादा लोगों में बंटने के कारण प्रतिव्यक्ति खर्च कम हो।
तो गाँधी जी ने एक समय पर ग्राम स्वराज्य की परिकल्पना तो की थी पर वह माडल क्या आज के ग्लोबलाइजेशन युग, जहाँ पर हर चीज में कार्यक्षमता आगे है, में संभव है? क्या भारत को ग्राम प्रधान देश ही रहना चाहिए?
3 Responses
kamal sharma
अप्रैल 13th, 2007 at 9:40 am
1ग्रामीण पत्रकारिता को भारत में अब तक नजरअंदाज किया गया है लेकिन अब तो बड़ी बड़ी कंपनियों को भी समझ में आ गया है कि ग्रामीण बाजार की अनदेखी उन्हें भारी पड़ सकती है। हालांकि आपने यह सही कहा कि मीडिया वाले ग्रामीण क्षेत्रों में पत्रकारों की स्थाई नियुक्ति नहीं करते, जो इसे बढ़ावा देने में एक बड़ी परेशानी है। ग्रामीण क्षेत्रों में पारिश्रमिक भी कम दिया जाता है। यदि मीडिया समूह गांवों में स्थाई नियुक्ति, बेहतर वेतन और लेपटॉप जैसी दूसरी सुविधाएं देने लगे तो शहरों में कई पत्रकार आना ही पसंद नहीं करेंगे। मैं आपको मेरे बारे में ही बताता हूं कि यदि मुझे गांवों में ठीक पैसा मिलता तो मुंबई में पत्रकारिता करने नहीं आता। लेकिन क्या किया जा सकता। प्रिंट वाले अभी भी सेंटीमीटर के हिसाब से भुगतान करते हैं और फोन के खर्चे तक नहीं देते। इलेक्ट्रॉनिक माध्यम वाले प्रति स्टोरी पैसा देते हैं और वहां रोज रोज बड़ी वैसी स्टोरी होती नहीं जैसी मल्लिका शेरावत के मुंबई में नाचने पर बनती है। ठुमके गांवों में लगते नहीं, वहां कोई सेलिब्रिटी आकर खाना खाते नहीं और गांव वाले खा रहे हैं या भूखे हैं, इसकी स्टोरी कोई कवर करता नहीं। वेब पत्रकारिता का तो गांवों में कोई भविष्य नहीं है।
जीतू
अप्रैल 13th, 2007 at 10:54 pm
2अरे भई! सब बाजारवाद का खेल है। अभी देखना।
जैसे शहरों के बाद, कस्बों के बाजारों पर बाजारवाद हावी हो रहा है, या कहो बाजार का विस्तार हो रहा है। ठीक उसी तरह गाँवो गाँवो तक ये क्रांति पहुँचेगी। भले ही शहरों मे बैठे पत्रकार, डाक्टर और अन्य पेशेवर वहाँ ना जाना चाहें लेकिन ये बाजार अपनी जरुरत के हिसाब से इलाज ढूंढ लेंगे। आवश्यकता अविष्कार की जननी है। गाँवों के ही नौजवान कमान सम्भालेंगे और बिलीब इट ओर नॉट, शहरों के पेशेवरों को कड़ी टक्कर देंगे। क्रांति तो अभी बस शुरु ही हुई है।
robin bhakhan
जून 3rd, 2007 at 10:54 pm
3the topic on the villages has been eloborated brilliantly and i think i need more attention of the policy makers……… and we, the people aslo need to take part in that…….
nice post and keep it up!!!!
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