पिछले नौं साल से कम्पयूटर इंडस्टरी में काम कर रहा हूँ व उस से भी ज्यादा देर से इसके बारे में जानता हूँ। काफी बार यह प्रश्न दिमाग में आता है कि ये मार्किट कम्पयूटर ज्ञान को इतनी तवज्जो क्यों देती है? आज के दौर में एक साथ इतने सारे लोगों को बाकी लोगों से औसतन ज्यादा पैसे देने वाली इंडस्टरी शायद कम्पयूटर ही है।
इस प्रश्न का जवाब यदि एक शब्द में देना हो तो वह है इनोवेशन या नवोत्पाद। अब यदि एक तरफ आप मारुति में मशीन के पास काम करने वाला वर्कर लें और दूसरी तरफ इंफोसिस में काम करने वाला वर्कर लें तो दोनों में क्या अंतर पाएंगे। मारूति वाले आदमी का काम पूरी तरह से निर्धारित है। हर रोज उसे गिन चुने काम पहले से निर्धारित प्रक्रिया से पूरे करने हैं। वहीं दूसरी तरफ इंफोसिस वाले आदमी को हर चार पाँच महीने में नए प्रोजेक्ट पर काम करना है। हर जगह कुछ न कुछ नया करना है। हो सकता है उसे नए प्रोग्राम लिखने हों और अच्छा प्रोग्राम लिखना व कविता लिखना बराबर ही है। हो सकता है उसे क्लाइंट के वातावरण के हिसाब से कुछ नया लगाना हो।
तो बस यही छोटी सी बात है कि आप किसी काम के लिए पहले से निर्धारित प्रक्रिया से काम करते हैं या आपको यह बार बार बदलनी पड़ती है निर्धारित करता है कि मार्किट आप के काम की क्या कीमत लगाती है।
16 Responses
जीतू
अप्रैल 27th, 2007 at 12:10 am
1मिर्ची सेठ,
ये हमारी रोजी-रोटी है (रोजी मेरी सेक्रेटरी का नाम है) , इसके बारे मे सवाल उठाओगे तो हम लोग कहाँ जाएंगे, ले दे कर एक ही चीज तो आती है वो है कम्पयूटर ज्ञान। काहे इसके पीछे पड़े हो भाई?
अरुण
अप्रैल 27th, 2007 at 12:45 am
2मतलब जीतू भाई (रोजी मेरी सेक्रेटरी का नाम है)और मिर्ची सेठ (पैसे )ने रोजी- रोटी को आपस मे बाट लिया,भाई और भी लोग लाईन मे है
Ram Chandra Mishra
अप्रैल 27th, 2007 at 1:00 am
3अतुल शर्मा
अप्रैल 27th, 2007 at 1:17 am
4बात तो आपकी सही है। मैं कम्प्यूटर के क्षेत्र से नहीं हूँ परंतु काम कुछ ऐसा है कि समझ लीजिए मारुति के वर्कर जैसा नहीं है और हर समय नया करने में कुछ पीड़ा भी होती है और इसी पीड़ा के बदलें में मिलता है अधिक पैसा।
आशीष
अप्रैल 27th, 2007 at 1:51 am
5एक तो नये नये प्रोजेक्ट मे काम करना ही होता है दूसरे हर दिन बदलती टेक्नालाजी भी तो सीखनी होती है।
बा्की सब ठीक है लेकिन मिर्ची सेठ हमारी रोजी रोटी पर सवाल क्यों उठा रहे हो ? कम्युनिस्ट पार्टी से तो नही जूड़ गये आप
भाई इसमे समाजवाद या सामाजिक न्याय की बात मत करना नही तो अर्जुन सिंह सुन लेगा और इसमे भी आरक्षण लागु कर देगा !
रवि
अप्रैल 27th, 2007 at 2:43 am
6“…भाई इसमे समाजवाद या सामाजिक न्याय की बात मत करना नही तो अर्जुन सिंह सुन लेगा और इसमे भी आरक्षण लागु कर देगा !…”
और चुनाव आसपास हों तो जबरन लागू करवा देगा!
kamal
अप्रैल 27th, 2007 at 4:02 am
7मानसिक काम का महत्व शारीरिक काम से हमेशा से ज्यादा होता है . क्योकि शारीरिक काम एक विज्ञान की तरह है जिसे यदि कोई चाहे तो कर सकता है पर मानसिक काम एक कला है . जिसमें सृजनात्मक शक्ति की आवश्यक होती है . लेकिन फिर भी मैं तो यही कहुंगा कि अभी तो कंप्यूटर इंडस्ट्री में गधे , घोड़े सबको पैसे मिल रहे हैं . in long run there would be distinction between good ones and bad ones and that would be better for the ‘good ones’.
ghughutibasuti
अप्रैल 27th, 2007 at 6:33 am
8जब मिल रहा है अधिक तो चुपचाप लेते जाओ । कल किसने देखा है ?
घुघूती बासूती
राजीव
अप्रैल 27th, 2007 at 1:37 pm
9भाई मिर्ची सेठ,
क्षमा करें, पहले मैंने एक टिप्पणी देनी चाही - संक्षिप्त रूप में, बहुत विचार थे इस विषय पर सो कुछ (बहुत) बड़ी हो गयी तब मुझे अपने संबंधित विचारो को अपने चिट्ठे पर स्वतंत्र रूप से प्रस्तुत करना बेहतर लगा। शेष विस्तृत विवरण यहाँ पर है
कम्प्यूटर व्यवसाय में अधिक आय - मेरे विचार
श्रीश शर्मा 'ई-पंडित'
अप्रैल 27th, 2007 at 3:43 pm
10सब मिल कर जोर से बोलिए - कंप्यूटर बाबा की जय!!
ratna
अप्रैल 27th, 2007 at 10:53 pm
11मन कर रहा है कि मैनर्स को ताक पर रख पूंछू– कितने मिलते है। हा- हा।
suresh chiplunkar
अप्रैल 27th, 2007 at 11:36 pm
12भाई पैसे ज्यादा मिलते हैं तभी तो इन्हीं लोगों की बदौलत अस्सी प्रतिशत भारत महँगा गेहूँ खा रहा है… हमारे मालवा का गेहूँ ११०० रुपये क्विंटल में कम्प्यूटर वाला हँसकर ले लेगा, लेकिन यहीं का गेहूँ हम जैसे लोग ११०० रुपये में कहाँ से खरीदेंगे और कितना खरीदेंगे… बडे-बडे शॉपिंग माल में हमारे लिये कुछ नहीं है… सब software वालों के लिये है… रिलायंस और भारती आकर हमारे मुँह से दाल और सब्जी भी छीनने वाले हैं, क्योंकि उन्हें software वाले मुँहमाँगे पैसे देने को तैयार हैं…हर चीज महंगी और महंगी होती जा रही है चाहे उसे खरीदने की ताकत रखने वाले महज कुछ प्रतिशत ही हों…
बात पैसे की नहीं नव-सृजन की थी | मिर्ची सेठ
अप्रैल 28th, 2007 at 9:41 am
13[…] प्रविष्टि की मिली टिप्पणियों से लगता है कि मैं […]
Amit Gupta
अप्रैल 29th, 2007 at 2:40 am
14मैं नहीं समझता कि ऐसी कोई बात है। कंप्यूटर और सॉफ़्टवेयर वालों को अच्छा वेतन मिलना महंगाई का कारण नहीं है, क्योंकि इसका अर्थ तो यह हुआ कि जैसे भारतीय समाज में अमीर लोग कंप्यूटर आने से पहले थे ही नहीं, क्यों? लेकिन ऐसा नहीं है, अमीर लोग तो सदियों से हैं जो उँचे दाम में चीज़ें खरीदते थे और खरीदते हैं।
पुनः बेकार की बात है। शॉपिंग मॉलों में भी वही दुकाने हैं जो पहले अन्य मार्किट कॉमप्लेक्सों में थीं। यदि ये दुकानें पहले और अभी भी आपकी पहुँच से बाहर हैं तो शॉपिंग मॉल खुल जाने से ये सोचना, कि ये दुकाने और इनका माल सस्ता हो पहुँच में आ जाएगा, सरासर मूर्खता ही है मेरी निगाह में। उदाहरणार्थ; लो-रियाल के सलून शॉपिंग मॉल खुलने से पहले भी दिल्ली में थे, पहले भी वो महँगे थे और अब शॉपिंग मॉल में खुलने के बाद भी महँगे हैं, कोई फर्क नहीं आ गया है उनके दामों में कि मैं शॉपिंग मॉल में पहुँच जाऊँ। ऐसे ही बहुत सी अन्य दुकानों के उदाहरण दे सकता हूँ। अन्य उदाहरण में, अडीडास के जूते या लेवाई/विल्स के कपड़े मॉलों के बाहर भी मिलते हैं जिनको मैं लेता/ले सकता हूँ और उसी दाम पर वो मुझे मॉलों में भी मिलते हैं, तो मॉल खुलने से उनके दामों में भी कोई फर्क नहीं आया है। शॉपिंग मॉल सिर्फ एक ऐसी जगह है जहाँ आपको एक ही परिसर में बहुत सी अलग-२ दुकाने मिल जाएँगी। लेकिन यह सोचना कि उनमें दाम कम हो जाएगा बाहर अन्य दुकानों के मुकाबले सरासर मूर्खता है।
इस संदर्भ में कृपया अपनी बात को विस्तार से समझाईये, क्योंकि मैं नहीं समझता कि आपका जो आशय मैं समझ रहा हूँ वह सही है। मुँह-माँगे पैसे देने वाले सदियों से समाज में हैं, तो क्या बाकी लोग उसके कारण भूखे मर गए?
आप बात अमीरी और गरीबी पर ले गए हैं सुरेश जी, फर्क इतना है कि सॉफ़्टवेयर वालों को आपने अमीरी का पर्याय मान लिया है जो कि सरासर गलत है। वे लोग भी अन्य लोगों की भांति जी-तोड़ मेहनत करते हैं, फोकट की नहीं खाते। अब उनको वेतन अधिक मिलता है तो इसमें उनका दोष है क्या?? कोई अपनी मेहनत और अक्ल से अमीर बना है तो उसने गुनाह किया है? आज की दुनिया में पैसा कमाना कोई बड़ी बात नहीं है, व्यक्ति यदि समझदारी से काम करे तो। समझदारी से काम करने पर तो सड़क पर छोले-भठूरे की रेहड़ी लगाने वाला भी अच्छे-खासे पैसे कमा लेता है और जिसमें समझ नहीं वो कलपता ही रह जाता है। अब किसी में समझ नहीं तो इसमें समझ वालों का दोष है? आपके कहने अनुसार तो ऐसा ही लगता है!!
कम्प्यूटर कर्मियों का कम काम « तकनीकी चिट्ठा
मई 1st, 2007 at 9:35 pm
15[…] दिनों पहले पंकज जी ने सवाल उठाया कि कंप्यूटर वालों को इतने सारे पैसे […]
विकास कुमार
मई 17th, 2007 at 1:32 am
16भईया, मैं तो ‘पुणे’ की मंहगाई देख देख के उकता गया हूँ। कारण कंप्यूटर वाले लोग ही हैं…ज्यादा कमाते हैं ज्यादा खर्च करते हैं…और पिस जाते हैं हम गरीब।
सोच रहा हूँ कि कालेज से निकलने के बाद सीधे इसी धंधे में घुस जाऊं।
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