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	<title>Comments on: ये कम्पयूटर वालों को इतने पैसे क्यों मिलते हैं?</title>
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	<description>मिर्ची सी जिंदगी, कभी मंदी कभी तेज</description>
	<pubDate>Fri, 16 May 2008 23:40:46 +0000</pubDate>
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		<title>By: विकास कुमार</title>
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		<author>विकास कुमार</author>
		<pubDate>Thu, 17 May 2007 09:32:19 +0000</pubDate>
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		<description>भईया, मैं तो 'पुणे' की मंहगाई देख देख के उकता गया हूँ। कारण कंप्यूटर वाले लोग ही हैं...ज्यादा कमाते हैं ज्यादा खर्च करते हैं...और पिस जाते हैं हम गरीब। :( सोच रहा हूँ कि कालेज से निकलने के बाद सीधे इसी धंधे में घुस जाऊं।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>भईया, मैं तो &#8216;पुणे&#8217; की मंहगाई देख देख के उकता गया हूँ। कारण कंप्यूटर वाले लोग ही हैं&#8230;ज्यादा कमाते हैं ज्यादा खर्च करते हैं&#8230;और पिस जाते हैं हम गरीब। <img src='http://ms.pnarula.com/blog/wp-includes/images/smilies/icon_sad.gif' alt=':(' class='wp-smiley' /> सोच रहा हूँ कि कालेज से निकलने के बाद सीधे इसी धंधे में घुस जाऊं।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: कम्प्यूटर कर्मियों का कम काम &#171; तकनीकी चिट्ठा</title>
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		<author>कम्प्यूटर कर्मियों का कम काम &#171; तकनीकी चिट्ठा</author>
		<pubDate>Wed, 02 May 2007 05:35:33 +0000</pubDate>
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		<description>[...] दिनों पहले पंकज जी ने सवाल उठाया कि कंप्यूटर वालों को इतने सारे पैसे [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[&#8230;] दिनों पहले पंकज जी ने सवाल उठाया कि कंप्यूटर वालों को इतने सारे पैसे [&#8230;]</p>
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	<item>
		<title>By: Amit Gupta</title>
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		<author>Amit Gupta</author>
		<pubDate>Sun, 29 Apr 2007 10:40:03 +0000</pubDate>
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		<description>&lt;blockquote&gt;भाई पैसे ज्यादा मिलते हैं तभी तो इन्हीं लोगों की बदौलत अस्सी प्रतिशत भारत महँगा गेहूँ खा रहा है…&lt;/blockquote&gt;
मैं नहीं समझता कि ऐसी कोई बात है। कंप्यूटर और सॉफ़्टवेयर वालों को अच्छा वेतन मिलना महंगाई का कारण नहीं है, क्योंकि इसका अर्थ तो यह हुआ कि जैसे भारतीय समाज में अमीर लोग कंप्यूटर आने से पहले थे ही नहीं, क्यों? लेकिन ऐसा नहीं है, अमीर लोग तो सदियों से हैं जो उँचे दाम में चीज़ें खरीदते थे और खरीदते हैं।

&lt;blockquote&gt;बडे-बडे शॉपिंग माल में हमारे लिये कुछ नहीं है… सब software वालों के लिये है&lt;/blockquote&gt;
पुनः बेकार की बात है। शॉपिंग मॉलों में भी वही दुकाने हैं जो पहले अन्य मार्किट कॉमप्लेक्सों में थीं। यदि ये दुकानें पहले और अभी भी आपकी पहुँच से बाहर हैं तो शॉपिंग मॉल खुल जाने से ये सोचना, कि ये दुकाने और इनका माल सस्ता हो पहुँच में आ जाएगा, सरासर मूर्खता ही है मेरी निगाह में। उदाहरणार्थ; लो-रियाल के सलून शॉपिंग मॉल खुलने से पहले भी दिल्ली में थे, पहले भी वो महँगे थे और अब शॉपिंग मॉल में खुलने के बाद भी महँगे हैं, कोई फर्क नहीं आ गया है उनके दामों में कि मैं शॉपिंग मॉल में पहुँच जाऊँ। ऐसे ही बहुत सी अन्य दुकानों के उदाहरण दे सकता हूँ। अन्य उदाहरण में, अडीडास के जूते या लेवाई/विल्स के कपड़े मॉलों के बाहर भी मिलते हैं जिनको मैं लेता/ले सकता हूँ और उसी दाम पर वो मुझे मॉलों में भी मिलते हैं, तो मॉल खुलने से उनके दामों में भी कोई फर्क नहीं आया है। शॉपिंग मॉल सिर्फ एक ऐसी जगह है जहाँ आपको एक ही परिसर में बहुत सी अलग-२ दुकाने मिल जाएँगी। लेकिन यह सोचना कि उनमें दाम कम हो जाएगा बाहर अन्य दुकानों के मुकाबले सरासर मूर्खता है।

&lt;blockquote&gt;रिलायंस और भारती आकर हमारे मुँह से दाल और सब्जी भी छीनने वाले हैं, क्योंकि उन्हें software वाले मुँहमाँगे पैसे देने को तैयार हैं…हर चीज महंगी और महंगी होती जा रही है चाहे उसे खरीदने की ताकत रखने वाले महज कुछ प्रतिशत ही हों…&lt;/blockquote&gt;
इस संदर्भ में कृपया अपनी बात को विस्तार से समझाईये, क्योंकि मैं नहीं समझता कि आपका जो आशय मैं समझ रहा हूँ वह सही है। मुँह-माँगे पैसे देने वाले सदियों से समाज में हैं, तो क्या बाकी लोग उसके कारण भूखे मर गए?

आप बात अमीरी और गरीबी पर ले गए हैं सुरेश जी, फर्क इतना है कि &lt;em&gt;सॉफ़्टवेयर&lt;/em&gt; वालों को आपने अमीरी का पर्याय मान लिया है जो कि सरासर गलत है। वे लोग भी अन्य लोगों की भांति जी-तोड़ मेहनत करते हैं, फोकट की नहीं खाते। अब उनको वेतन अधिक मिलता है तो इसमें उनका दोष है क्या?? कोई अपनी मेहनत और अक्ल से अमीर बना है तो उसने गुनाह किया है? आज की दुनिया में पैसा कमाना कोई बड़ी बात नहीं है, व्यक्ति यदि समझदारी से काम करे तो। समझदारी से काम करने पर तो सड़क पर छोले-भठूरे की रेहड़ी लगाने वाला भी अच्छे-खासे पैसे कमा लेता है और जिसमें समझ नहीं वो कलपता ही रह जाता है। अब किसी में समझ नहीं तो इसमें समझ वालों का दोष है? आपके कहने अनुसार तो ऐसा ही लगता है!! ;)</description>
		<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p>भाई पैसे ज्यादा मिलते हैं तभी तो इन्हीं लोगों की बदौलत अस्सी प्रतिशत भारत महँगा गेहूँ खा रहा है…</p></blockquote>
<p>मैं नहीं समझता कि ऐसी कोई बात है। कंप्यूटर और सॉफ़्टवेयर वालों को अच्छा वेतन मिलना महंगाई का कारण नहीं है, क्योंकि इसका अर्थ तो यह हुआ कि जैसे भारतीय समाज में अमीर लोग कंप्यूटर आने से पहले थे ही नहीं, क्यों? लेकिन ऐसा नहीं है, अमीर लोग तो सदियों से हैं जो उँचे दाम में चीज़ें खरीदते थे और खरीदते हैं।</p>
<blockquote><p>बडे-बडे शॉपिंग माल में हमारे लिये कुछ नहीं है… सब software वालों के लिये है</p></blockquote>
<p>पुनः बेकार की बात है। शॉपिंग मॉलों में भी वही दुकाने हैं जो पहले अन्य मार्किट कॉमप्लेक्सों में थीं। यदि ये दुकानें पहले और अभी भी आपकी पहुँच से बाहर हैं तो शॉपिंग मॉल खुल जाने से ये सोचना, कि ये दुकाने और इनका माल सस्ता हो पहुँच में आ जाएगा, सरासर मूर्खता ही है मेरी निगाह में। उदाहरणार्थ; लो-रियाल के सलून शॉपिंग मॉल खुलने से पहले भी दिल्ली में थे, पहले भी वो महँगे थे और अब शॉपिंग मॉल में खुलने के बाद भी महँगे हैं, कोई फर्क नहीं आ गया है उनके दामों में कि मैं शॉपिंग मॉल में पहुँच जाऊँ। ऐसे ही बहुत सी अन्य दुकानों के उदाहरण दे सकता हूँ। अन्य उदाहरण में, अडीडास के जूते या लेवाई/विल्स के कपड़े मॉलों के बाहर भी मिलते हैं जिनको मैं लेता/ले सकता हूँ और उसी दाम पर वो मुझे मॉलों में भी मिलते हैं, तो मॉल खुलने से उनके दामों में भी कोई फर्क नहीं आया है। शॉपिंग मॉल सिर्फ एक ऐसी जगह है जहाँ आपको एक ही परिसर में बहुत सी अलग-२ दुकाने मिल जाएँगी। लेकिन यह सोचना कि उनमें दाम कम हो जाएगा बाहर अन्य दुकानों के मुकाबले सरासर मूर्खता है।</p>
<blockquote><p>रिलायंस और भारती आकर हमारे मुँह से दाल और सब्जी भी छीनने वाले हैं, क्योंकि उन्हें software वाले मुँहमाँगे पैसे देने को तैयार हैं…हर चीज महंगी और महंगी होती जा रही है चाहे उसे खरीदने की ताकत रखने वाले महज कुछ प्रतिशत ही हों…</p></blockquote>
<p>इस संदर्भ में कृपया अपनी बात को विस्तार से समझाईये, क्योंकि मैं नहीं समझता कि आपका जो आशय मैं समझ रहा हूँ वह सही है। मुँह-माँगे पैसे देने वाले सदियों से समाज में हैं, तो क्या बाकी लोग उसके कारण भूखे मर गए?</p>
<p>आप बात अमीरी और गरीबी पर ले गए हैं सुरेश जी, फर्क इतना है कि <em>सॉफ़्टवेयर</em> वालों को आपने अमीरी का पर्याय मान लिया है जो कि सरासर गलत है। वे लोग भी अन्य लोगों की भांति जी-तोड़ मेहनत करते हैं, फोकट की नहीं खाते। अब उनको वेतन अधिक मिलता है तो इसमें उनका दोष है क्या?? कोई अपनी मेहनत और अक्ल से अमीर बना है तो उसने गुनाह किया है? आज की दुनिया में पैसा कमाना कोई बड़ी बात नहीं है, व्यक्ति यदि समझदारी से काम करे तो। समझदारी से काम करने पर तो सड़क पर छोले-भठूरे की रेहड़ी लगाने वाला भी अच्छे-खासे पैसे कमा लेता है और जिसमें समझ नहीं वो कलपता ही रह जाता है। अब किसी में समझ नहीं तो इसमें समझ वालों का दोष है? आपके कहने अनुसार तो ऐसा ही लगता है!! <img src='http://ms.pnarula.com/blog/wp-includes/images/smilies/icon_wink.gif' alt=';)' class='wp-smiley' /></p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: बात पैसे की नहीं नव-सृजन की थी &#124; मिर्ची सेठ</title>
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		<author>बात पैसे की नहीं नव-सृजन की थी &#124; मिर्ची सेठ</author>
		<pubDate>Sat, 28 Apr 2007 17:41:53 +0000</pubDate>
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		<description>[...] प्रविष्टि की मिली टिप्पणियों से लगता है कि मैं [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[&#8230;] प्रविष्टि की मिली टिप्पणियों से लगता है कि मैं [&#8230;]</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: suresh chiplunkar</title>
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		<author>suresh chiplunkar</author>
		<pubDate>Sat, 28 Apr 2007 07:36:07 +0000</pubDate>
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		<description>भाई पैसे ज्यादा मिलते हैं तभी तो इन्हीं लोगों की बदौलत अस्सी प्रतिशत भारत महँगा गेहूँ खा रहा है... हमारे मालवा का गेहूँ ११०० रुपये क्विंटल में कम्प्यूटर वाला हँसकर ले लेगा, लेकिन यहीं का गेहूँ हम जैसे लोग ११०० रुपये में कहाँ से खरीदेंगे और कितना खरीदेंगे... बडे-बडे शॉपिंग माल में हमारे लिये कुछ नहीं है... सब software वालों के लिये है... रिलायंस और भारती आकर हमारे मुँह से दाल और सब्जी भी छीनने वाले हैं, क्योंकि उन्हें software वाले मुँहमाँगे पैसे देने को तैयार हैं...हर चीज महंगी और महंगी होती जा रही है चाहे उसे खरीदने की ताकत रखने वाले महज कुछ प्रतिशत ही हों...</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>भाई पैसे ज्यादा मिलते हैं तभी तो इन्हीं लोगों की बदौलत अस्सी प्रतिशत भारत महँगा गेहूँ खा रहा है&#8230; हमारे मालवा का गेहूँ ११०० रुपये क्विंटल में कम्प्यूटर वाला हँसकर ले लेगा, लेकिन यहीं का गेहूँ हम जैसे लोग ११०० रुपये में कहाँ से खरीदेंगे और कितना खरीदेंगे&#8230; बडे-बडे शॉपिंग माल में हमारे लिये कुछ नहीं है&#8230; सब software वालों के लिये है&#8230; रिलायंस और भारती आकर हमारे मुँह से दाल और सब्जी भी छीनने वाले हैं, क्योंकि उन्हें software वाले मुँहमाँगे पैसे देने को तैयार हैं&#8230;हर चीज महंगी और महंगी होती जा रही है चाहे उसे खरीदने की ताकत रखने वाले महज कुछ प्रतिशत ही हों&#8230;</p>
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		<title>By: ratna</title>
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		<author>ratna</author>
		<pubDate>Sat, 28 Apr 2007 06:53:16 +0000</pubDate>
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		<description>मन कर रहा है कि मैनर्स को ताक पर रख पूंछू-- कितने मिलते है। हा- हा।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>मन कर रहा है कि मैनर्स को ताक पर रख पूंछू&#8211; कितने मिलते है। हा- हा।</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: श्रीश शर्मा 'ई-पंडित'</title>
		<link>http://ms.pnarula.com/200704/%e0%a4%95%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%aa%e0%a4%af%e0%a5%82%e0%a4%9f%e0%a4%b0-%e0%a4%87%e0%a4%82%e0%a4%a1%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a4%be/#comment-7327</link>
		<author>श्रीश शर्मा 'ई-पंडित'</author>
		<pubDate>Fri, 27 Apr 2007 23:43:37 +0000</pubDate>
		<guid>http://ms.pnarula.com/200704/%e0%a4%95%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%aa%e0%a4%af%e0%a5%82%e0%a4%9f%e0%a4%b0-%e0%a4%87%e0%a4%82%e0%a4%a1%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a4%be/#comment-7327</guid>
		<description>सब मिल कर जोर से बोलिए - कंप्यूटर बाबा की जय!!</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>सब मिल कर जोर से बोलिए - कंप्यूटर बाबा की जय!!</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: राजीव</title>
		<link>http://ms.pnarula.com/200704/%e0%a4%95%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%aa%e0%a4%af%e0%a5%82%e0%a4%9f%e0%a4%b0-%e0%a4%87%e0%a4%82%e0%a4%a1%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a4%be/#comment-7323</link>
		<author>राजीव</author>
		<pubDate>Fri, 27 Apr 2007 21:37:19 +0000</pubDate>
		<guid>http://ms.pnarula.com/200704/%e0%a4%95%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%aa%e0%a4%af%e0%a5%82%e0%a4%9f%e0%a4%b0-%e0%a4%87%e0%a4%82%e0%a4%a1%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a4%be/#comment-7323</guid>
		<description>भाई मिर्ची सेठ,

क्षमा करें, पहले मैंने एक टिप्पणी देनी चाही - संक्षिप्त रूप में, बहुत विचार थे इस विषय पर सो कुछ (बहुत) बड़ी हो गयी तब मुझे अपने संबंधित विचारो को अपने चिट्ठे पर स्वतंत्र रूप से प्रस्तुत करना बेहतर लगा। शेष विस्तृत विवरण यहाँ पर है

&lt;a href="http://antarim.blogspot.com/2007/04/higher-income-in-computer-industry-some.html" rel="nofollow"&gt;कम्प्यूटर व्यवसाय में अधिक आय - मेरे विचार&lt;/a&gt;</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>भाई मिर्ची सेठ,</p>
<p>क्षमा करें, पहले मैंने एक टिप्पणी देनी चाही - संक्षिप्त रूप में, बहुत विचार थे इस विषय पर सो कुछ (बहुत) बड़ी हो गयी तब मुझे अपने संबंधित विचारो को अपने चिट्ठे पर स्वतंत्र रूप से प्रस्तुत करना बेहतर लगा। शेष विस्तृत विवरण यहाँ पर है</p>
<p><a href="http://antarim.blogspot.com/2007/04/higher-income-in-computer-industry-some.html" rel="nofollow">कम्प्यूटर व्यवसाय में अधिक आय - मेरे विचार</a></p>
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		<title>By: ghughutibasuti</title>
		<link>http://ms.pnarula.com/200704/%e0%a4%95%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%aa%e0%a4%af%e0%a5%82%e0%a4%9f%e0%a4%b0-%e0%a4%87%e0%a4%82%e0%a4%a1%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a4%be/#comment-7317</link>
		<author>ghughutibasuti</author>
		<pubDate>Fri, 27 Apr 2007 14:33:10 +0000</pubDate>
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		<description>जब मिल रहा है अधिक तो चुपचाप लेते जाओ । कल किसने देखा है ? 
घुघूती बासूती</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>जब मिल रहा है अधिक तो चुपचाप लेते जाओ । कल किसने देखा है ?<br />
घुघूती बासूती</p>
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		<title>By: kamal</title>
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		<author>kamal</author>
		<pubDate>Fri, 27 Apr 2007 12:02:35 +0000</pubDate>
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		<description>मानसिक काम का महत्व शारीरिक काम से हमेशा से ज्यादा होता है . क्योकि शारीरिक काम एक विज्ञान की तरह है जिसे यदि कोई चाहे तो कर सकता है पर मानसिक काम एक कला है . जिसमें सृजनात्मक शक्ति की आवश्यक होती है . लेकिन फिर भी मैं तो यही कहुंगा कि अभी तो कंप्यूटर इंडस्ट्री में गधे , घोड़े सबको पैसे मिल रहे हैं . in long run there would be distinction between good ones and bad ones and that would be better for the 'good ones'.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>मानसिक काम का महत्व शारीरिक काम से हमेशा से ज्यादा होता है . क्योकि शारीरिक काम एक विज्ञान की तरह है जिसे यदि कोई चाहे तो कर सकता है पर मानसिक काम एक कला है . जिसमें सृजनात्मक शक्ति की आवश्यक होती है . लेकिन फिर भी मैं तो यही कहुंगा कि अभी तो कंप्यूटर इंडस्ट्री में गधे , घोड़े सबको पैसे मिल रहे हैं . in long run there would be distinction between good ones and bad ones and that would be better for the &#8216;good ones&#8217;.</p>
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