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	<title>Comments on: हाँ भाई से किसने किए सवाल</title>
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	<description>मिर्ची सी जिंदगी, कभी मंदी कभी तेज</description>
	<pubDate>Fri, 25 Jul 2008 03:11:12 +0000</pubDate>
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		<title>By: अतुल शर्मा</title>
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		<author>अतुल शर्मा</author>
		<pubDate>Sat, 03 Mar 2007 10:06:58 +0000</pubDate>
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		<description>दिग्गजों मे बारे में जानना अच्छा लगता है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>दिग्गजों मे बारे में जानना अच्छा लगता है।</p>
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		<title>By: देबाशीष</title>
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		<author>देबाशीष</author>
		<pubDate>Thu, 01 Mar 2007 05:41:43 +0000</pubDate>
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		<description>मिर्ची सेठ के अंग्रेजी ब्लॉग पर हालिया प्रविष्टि से उम्मीद बंधी थी कि वे दुबारा लौट रहे हैं ब्लॉगलैंड में, यह पोस्ट देखकर सुखद अनुभव हुआ। पंकज ने अक्षरग्राम से जिस डोर में सब को पिरोया था मुझे लगता है कि थोड़ी मेहनत से उसे कसा का सकता है। सर्वज्ञ की भी हालत खस्ता है, मैं नया खाता बनाकर कर भी कुछ अपडेट नहीं कर सका, सेठ ध्यान दें ज़रा।

जीतू ने खूब कही, पंकज के साथ तुम लोगों ने निरंतर के लिये जब वर्डप्रेस विशेष निकाला था तब मेरी ही भी आँखें खुली थीं। हैरत होती है कि तब पंकज ने किस सरलता से मैट का का साक्षात्कार जुगाड़ लिया और जब हिन्दी वाले वर्डप्रेस से अंजान थे तब ये जानकारी उपलब्ध कराई। 

कभी कभी दिया जलाने आ जाया करो यार ;) चौखट रोशन रहने दो लोग आते रहते हैं।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>मिर्ची सेठ के अंग्रेजी ब्लॉग पर हालिया प्रविष्टि से उम्मीद बंधी थी कि वे दुबारा लौट रहे हैं ब्लॉगलैंड में, यह पोस्ट देखकर सुखद अनुभव हुआ। पंकज ने अक्षरग्राम से जिस डोर में सब को पिरोया था मुझे लगता है कि थोड़ी मेहनत से उसे कसा का सकता है। सर्वज्ञ की भी हालत खस्ता है, मैं नया खाता बनाकर कर भी कुछ अपडेट नहीं कर सका, सेठ ध्यान दें ज़रा।</p>
<p>जीतू ने खूब कही, पंकज के साथ तुम लोगों ने निरंतर के लिये जब वर्डप्रेस विशेष निकाला था तब मेरी ही भी आँखें खुली थीं। हैरत होती है कि तब पंकज ने किस सरलता से मैट का का साक्षात्कार जुगाड़ लिया और जब हिन्दी वाले वर्डप्रेस से अंजान थे तब ये जानकारी उपलब्ध कराई। </p>
<p>कभी कभी दिया जलाने आ जाया करो यार <img src='http://ms.pnarula.com/blog/wp-includes/images/smilies/icon_wink.gif' alt=';)' class='wp-smiley' /> चौखट रोशन रहने दो लोग आते रहते हैं।</p>
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	<item>
		<title>By: Srijan Shilpi &#187; Blog Archive &#187; मेरे जवाब भी हाजिर हैं</title>
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		<author>Srijan Shilpi &#187; Blog Archive &#187; मेरे जवाब भी हाजिर हैं</author>
		<pubDate>Wed, 28 Feb 2007 21:40:26 +0000</pubDate>
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		<description>[...] इंटरनेट और हिन्दी से जुड़े होने के बावजूद चिट्ठाकारी से काफी देर से जुड़ा, इसका भी कुछ अफसोस है। तकनीकी रूप से जागरूक नहीं होने के कारण ही यह देरी हुई। हालाँकि अपना डोमेन 2004 में ही रजिस्टर करा लिया था, लेकिन शुरुआत अंग्रेजी की साइट से की। बाद में हिन्दी का डायनेमिक फोण्ट भी बनवाया, लेकिन यूनिकोड का पता बाद में चला। आज ही मिर्ची सेठ की काफी अरसे बाद टैगिंग के इसी खेल के क्रम में पोस्ट देखी तो वहाँ मैंने यह टिप्पणी की: नींव का पत्थर बनना बड़े नसीब की बात है, महल के कंगूरे पर तो कौए भी कांव-कांव कर लेते हैं। आप हिन्दी चिट्ठाकारी की नींव में जड़े उन नायाब पत्थरों में से हैं जिनके बल पर चिट्ठाकारी का यह भव्य महल खड़ा हुआ है। इसका साज-श्रृंगार करने वाले, झाड़-फानूस लगाने वाले आते रहेंगे। लेकिन जो काम आलोक जी, देबू दा, आप और जीतू भाई ने किया है, उसके बिना चिट्ठाकारी का यह काम देख पाना मुमकिन न हो पाता। [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[&#8230;] इंटरनेट और हिन्दी से जुड़े होने के बावजूद चिट्ठाकारी से काफी देर से जुड़ा, इसका भी कुछ अफसोस है। तकनीकी रूप से जागरूक नहीं होने के कारण ही यह देरी हुई। हालाँकि अपना डोमेन 2004 में ही रजिस्टर करा लिया था, लेकिन शुरुआत अंग्रेजी की साइट से की। बाद में हिन्दी का डायनेमिक फोण्ट भी बनवाया, लेकिन यूनिकोड का पता बाद में चला। आज ही मिर्ची सेठ की काफी अरसे बाद टैगिंग के इसी खेल के क्रम में पोस्ट देखी तो वहाँ मैंने यह टिप्पणी की: नींव का पत्थर बनना बड़े नसीब की बात है, महल के कंगूरे पर तो कौए भी कांव-कांव कर लेते हैं। आप हिन्दी चिट्ठाकारी की नींव में जड़े उन नायाब पत्थरों में से हैं जिनके बल पर चिट्ठाकारी का यह भव्य महल खड़ा हुआ है। इसका साज-श्रृंगार करने वाले, झाड़-फानूस लगाने वाले आते रहेंगे। लेकिन जो काम आलोक जी, देबू दा, आप और जीतू भाई ने किया है, उसके बिना चिट्ठाकारी का यह काम देख पाना मुमकिन न हो पाता। [&#8230;]</p>
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		<title>By: नितिन</title>
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		<author>नितिन</author>
		<pubDate>Wed, 28 Feb 2007 11:08:36 +0000</pubDate>
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		<description>बहुत दिनों में आये लेकिन दुरुस्त आये। अच्छा लगा पढ कर।।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बहुत दिनों में आये लेकिन दुरुस्त आये। अच्छा लगा पढ कर।।</p>
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		<title>By: हिंदी ब्लॉगर</title>
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		<author>हिंदी ब्लॉगर</author>
		<pubDate>Wed, 28 Feb 2007 10:09:16 +0000</pubDate>
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		<description>आपको जानता तो पहले से हूँ. चलिए, अब कुछ और जानकारी मिली.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आपको जानता तो पहले से हूँ. चलिए, अब कुछ और जानकारी मिली.</p>
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		<title>By: Amit Gupta</title>
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		<author>Amit Gupta</author>
		<pubDate>Wed, 28 Feb 2007 08:32:12 +0000</pubDate>
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		<description>खूब भालो, कैसे भी लिखा, लिखा तो सही!! :)</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>खूब भालो, कैसे भी लिखा, लिखा तो सही!! <img src='http://ms.pnarula.com/blog/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /></p>
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		<title>By: रवि</title>
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		<author>रवि</author>
		<pubDate>Wed, 28 Feb 2007 08:00:35 +0000</pubDate>
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		<description>इंटरनेटिया हिन्दी के लिए मिर्ची सेठ का योगदान तो अतुलनीय है ही. उन्होंने अपने गल्ले से अक्षरग्राम जैसे आयोजन के लिए अरसे से निष्काम भाव से पैसा लगाया है. तकनीकी सहयोग तो अपने स्तर पर सभी करते हैं.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>इंटरनेटिया हिन्दी के लिए मिर्ची सेठ का योगदान तो अतुलनीय है ही. उन्होंने अपने गल्ले से अक्षरग्राम जैसे आयोजन के लिए अरसे से निष्काम भाव से पैसा लगाया है. तकनीकी सहयोग तो अपने स्तर पर सभी करते हैं.</p>
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		<title>By: सृजन शिल्पी</title>
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		<author>सृजन शिल्पी</author>
		<pubDate>Wed, 28 Feb 2007 07:23:54 +0000</pubDate>
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		<description>नींव का पत्थर बनना बड़े नसीब की बात है, महल के कंगूरे पर तो कौए भी कांव-कांव कर लेते हैं। आप हिन्दी चिट्ठाकारी की नींव में जड़े उन नायाब पत्थरों में से हैं जिनके बल पर चिट्ठाकारी का यह भव्य महल खड़ा हुआ है। इसका साज-श्रृंगार करने वाले, झाड़-फानूस लगाने वाले आते रहेंगे। लेकिन जो काम आलोक जी, देबू दा, आप और जीतू भाई ने किया है, उसके बिना यह चिट्ठाकारी का मुकाम देख पाना मुमकिन न हो पाता। 

आप समय निकालकर चिट्ठाकारी के रंगमंच पर कभी-कभार अपनी भूमिका को आगे बढ़ाने का प्रयास करते रहें।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>नींव का पत्थर बनना बड़े नसीब की बात है, महल के कंगूरे पर तो कौए भी कांव-कांव कर लेते हैं। आप हिन्दी चिट्ठाकारी की नींव में जड़े उन नायाब पत्थरों में से हैं जिनके बल पर चिट्ठाकारी का यह भव्य महल खड़ा हुआ है। इसका साज-श्रृंगार करने वाले, झाड़-फानूस लगाने वाले आते रहेंगे। लेकिन जो काम आलोक जी, देबू दा, आप और जीतू भाई ने किया है, उसके बिना यह चिट्ठाकारी का मुकाम देख पाना मुमकिन न हो पाता। </p>
<p>आप समय निकालकर चिट्ठाकारी के रंगमंच पर कभी-कभार अपनी भूमिका को आगे बढ़ाने का प्रयास करते रहें।</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: संजय बेंगानी</title>
		<link>http://ms.pnarula.com/200702/%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%81-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%88-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%b8%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%8f-%e0%a4%b8%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b2/#comment-6043</link>
		<author>संजय बेंगानी</author>
		<pubDate>Wed, 28 Feb 2007 05:26:48 +0000</pubDate>
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		<description>भला हो टैगींग का, सेठज, आपके दर्शन तो हुए.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>भला हो टैगींग का, सेठज, आपके दर्शन तो हुए.</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: जीतू</title>
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		<author>जीतू</author>
		<pubDate>Wed, 28 Feb 2007 05:05:23 +0000</pubDate>
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		<description>बहुत सही जवाब दिए, मिर्ची सेठ।
कहाँ गायब रहते हो भई।  कभी कभी आ जाया करो, इधर भी।

सच पूछा जाए तो मिर्ची सेठ भी आलोक और देबू की तरह हिन्दी चिट्ठाकारी के प्रणेता है। आलोक ने जहाँ फोन्ट के पचड़े से हटकर यूनीकोड अपनाया, देबू ने उसे आगे बढाया, सामूहिक स्वरुप दिया। वही पंकज नरुला ( मिर्ची सेठ) ने हिन्दी चिट्ठाकारों के लिए वर्डप्रेस के दरवाजे खोले। मैने वर्डप्रेस के बारे मे सबसे पहले इनसे ही सुना। मेरे लिए वर्डप्रेस का सैट-अप करना, हर छोटी बड़ी परेशानी के लिए पंकज भाई ही हमारे गुरु ही थे। ना जाने इन्होने अपनी कितनी राते हिन्दी चिट्ठाकारों के सामूदायिक स्थलों के लिए काली की है।
इनका योगदान हिन्दी चिट्ठाकारी मे हमेशा याद रखा जाएगा।

आजकल पंकज काफ़ी व्यस्त रहते है, लेकिन मुझे आशा ही नही, वरन पूर्ण विश्वास है, जल्द ही वे हिन्दी चिट्ठाकारी मे सक्रिय रुप से भाग लेंगे।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बहुत सही जवाब दिए, मिर्ची सेठ।<br />
कहाँ गायब रहते हो भई।  कभी कभी आ जाया करो, इधर भी।</p>
<p>सच पूछा जाए तो मिर्ची सेठ भी आलोक और देबू की तरह हिन्दी चिट्ठाकारी के प्रणेता है। आलोक ने जहाँ फोन्ट के पचड़े से हटकर यूनीकोड अपनाया, देबू ने उसे आगे बढाया, सामूहिक स्वरुप दिया। वही पंकज नरुला ( मिर्ची सेठ) ने हिन्दी चिट्ठाकारों के लिए वर्डप्रेस के दरवाजे खोले। मैने वर्डप्रेस के बारे मे सबसे पहले इनसे ही सुना। मेरे लिए वर्डप्रेस का सैट-अप करना, हर छोटी बड़ी परेशानी के लिए पंकज भाई ही हमारे गुरु ही थे। ना जाने इन्होने अपनी कितनी राते हिन्दी चिट्ठाकारों के सामूदायिक स्थलों के लिए काली की है।<br />
इनका योगदान हिन्दी चिट्ठाकारी मे हमेशा याद रखा जाएगा।</p>
<p>आजकल पंकज काफ़ी व्यस्त रहते है, लेकिन मुझे आशा ही नही, वरन पूर्ण विश्वास है, जल्द ही वे हिन्दी चिट्ठाकारी मे सक्रिय रुप से भाग लेंगे।</p>
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