श्रीश जी के पिंग ने चिट्ठाजगत की दुनिया में फैली महामारी से परिचित कराया। पता लगा कि दिग्गज लोग नए नए तरीके से मल्टी लेवल मारक्टिंग की तरह अपने मित्रों को इस महामारी की चपेट में ला रहे हैं। मजे की बात है कि पहली बार मल्टी लेवल मार्कटिंग पसंद आ रही है। कत्ल होने वाले अपने कत्ल से खुश हैं और यही नहीं कातिल का शुक्रिया अदा कर रहे हैं। वाह री ब्लागिंग। चलिए अब जब इस महफिल में आ ही गए हैं तो ये काम भी कर लेते हैं। सवाल कुछ ऐसे थे कि जवाबों के लिए दो तीन साल वापिस जाना पड़ा। हाँ भाई के पुराने किस्से याद दिलाने के लिए श्रीश भाई का शुक्रिया। मेरे जवाब
१. कम्प्यूटर पर हिन्दी टाइपिंग के बारे में सबसे पहले आपने कब सुना और कैसे, अपने कम्प्यूटर में हिन्दी में सबसे पहले किस सॉफ्टवेयर में/द्वारा टाइप किया और कब, आपको उसके बारे में पता कैसे चला ?
हिन्दी ब्लॉगजगत में लिखी मेरी पहली प्रविष्टि "एक और खरबूजा" में इस बारे में फरवरी 8, 2004 लिखा था - भई net पर बहुत खरबूज़े हैं और खरबूज़े को देख कर खरबूज़ा रंग ना बदले ये तो हो ही नहीं सकता । तो हमने भी बिरादरी भाईयों को देख कर ब्लोग लिखना शुरू कर दिया । हनुमान जी के एक भगत ने बड़ा सुन्दर program तख्ती लिखा हुआ था बड़ा काम आया । आखिरी बार तख्ती चौथी कक्षा में लिखी थी (१९८३-१९८४) । वो भी सही दिन थे खड़िया से सुबह सुबह तख्ती पोत कर स्कूल जाते जाते तख्ती का सूखाना ।
२. आपका हिन्दी चिट्ठाजगत में आगमन कैसे हुआ, इसके बारे में कैसे पता लगा, पहला हिन्दी चिट्ठा/पोस्ट कौन सा पढ़ा/पढ़ी ? अपना चिट्ठा शुरु करने की कैसे सूझी ?(आलोक जी के लिए इस प्रश्न का संस्करण - हिन्दी में चिट्ठाकारी का विचार कैसे आया, ऐसा करते हुए मन में क्या ख्याल थे और बिना किसी मदद के शुरुआत कैसे की उस समय ?)
क्या किस्मत पाई है। लगता है श्रीश ने मेरा पुराना चिट्ठा पढ़ कर ही प्रश्न लिखे थे। इस प्रश्न का जवाब भी " कहाँ से आयो गोपाल" से चिपका रहा हूँ - याद नहीं चिट्ठाकारी की दुनिया में कदम कैसे रखे । शायद जॉन ऊडॅल का रेडिया मैंने सबसे पहले पढ़ा होगा । जावा से रोज़ी रोटी चलती है, इसलिए jroller.com पढ़ना शुरू हो गया । वहाँ एक ब्लॉग towards more light… लिखना आरंभ किया लेकिन वहाँ पूर्णतयः जावा केंद्रित होने के कारण निरंतरता नहीं बन पाई । इसी बीच गूगल भैया ने आलोक जी के चिट्ठे पर पटक कर हिंदी चिट्ठीकारिता से परिचित कराया और हाँ भाई का जन्म हुआ । तो ये हुआ गोपाल का आना ।
३. चिट्ठा लिखना सिर्फ छपास पीडा शांत करना है क्या ? आप अपने सुख के लिये लिखते हैं कि दूसरों के (दुख के लिये
क्या इससे आप के व्यक्तित्व में कोई परिवर्तन या निखार आया ? टिप्पणी का आपके जीवन में क्या और कितना महत्त्व है ?
हर व्यक्ति की कुछ न कुछ विशेषता होती है वह अपने आप को किसी न किसी चीज का माहिर मानता है। बचपन से ही नाम कम्पूटर बाबा व लेखू दे दिया गया था। समझ ही गए होंगे अन्य लाखों भारतीयों के तरह कम्पयूटर में हाथ तनिक साफ है। माँ बाप ने मार पीट कर भारतीयता भी ऐसी डाली है कि अमरीकियों का हिन्दी के वैज्ञानिक होने पर दिमाग चाट रहे होते हैं। कम्पयूटर पर हिन्दी की कमी खलती थी। जब सुशा फांट का 96-97 में आगमन हुआ था तो गर्मी की धूप में साइकिल चलाकर बस स्टैंड से पी सी क्वेस्ट खरीदने पहुंच गए थे। आलोक से हिन्दी यूनिकोड सीखने के बाद हिन्दी लिखना अपने आप में एक आनंद था। फिर अलग अलग चीजों (मूवेबल टाईप, वर्डप्रैस, सर्वज्ञ, अक्षरग्राम, निपुण, नारद इत्यादि) को हिन्दी में लगाने में अगले दो साल बीत गए।
इन सब बातों को सोचते हूए सोचता हूँ तो मेरे लिए छपास पीड़ा शांत करना तो नहीं रहा। एक तकनीकी चैलेंज, संजाल पर हिन्दी प्रेमियों का समूह खड़ा करना, नए नए भाईयों जैसे मित्र बनाना ज्यादा बड़ी बात रही। टिप्पणियों के मोह से परे नहीं हूँ। पता नहीं फुरसतिया जी ने कहा था या जीतू भाई ने पर बात बहुत पते की थी टिप्पणी तो प्रविष्टि की बिंदी की तरह हैं जिस के बिना प्रविष्टि का माथा सूना सा लगता है।
४. अपने जीवन की कोई उल्लेखनीय, खुशनुमा या धमाकेदार घटना(एं) बताएं, यदि न सूझे तो बचपन की कोई खास बात जो याद हो बता दें।
सिर्फ एक - आठवीं से लेकर बाहरवीं तक जेल जैसे हॉस्टल में कटी हैं। स्कूल व हॉस्टल एक ही कैम्पस में थे। महीने में सिर्फ एक बार ही बाहर जाने दिया जाता था। पर आजाद पंछी कहाँ रुकते हैं। हम लोगों ने कई गुप्त रास्ते बाहर जाने के बना रखे थे। हफ्ते में कम से कम एक बार बाहर भाग कर सर्दियों की सुबह रेहड़ी वाले से आलू के पराँठे खाने का मजा ही कुछ ओर था। ऐसे ही एक दिन वापिस आ रहे थे। वापिस आने के लिए आठ फुट की दिवार पर लगी दो फुट की कंटीली तार के नीचे से आना होता था। मैं दिवार के सर पर एक टाँग कैम्पस के बाहर और एक अंदर किए पेट के बल बैठा अंदर आने के लिए छलांग लगाने वाला था की नीचे से प्रिंसिपल सर आ गए। उनके बहुत कहने पर भी नीचे नहीं उतरा। उनके जाने के आधे घंटे बाद नीचे उतरा। कहने की जरुरत नहीं कि उस दिन मेरे साथ क्या हुआ।
५. यदि भगवान आपको भारतवर्ष की एक बात बदल देने का वरदान दें, तो आप क्या बदलना चाहेंगे/चाहेंगी ?
सभी लोग शिक्षित हों।
12 Responses
उन्मुक्त
फरवरी 27th, 2007 at 6:10 am
1चलिये इसी बहाने आपके दर्शन तो हुऐ।
श्रीश शर्मा 'ई-पंडित'
फरवरी 27th, 2007 at 4:57 pm
2वाह सब सवालों ले एकदम सही जवाब दिए आपने। आपको १००/१०० नंबर मिलते हैं।
नेट पर हिन्दी के इतिहास को जानने में मेरी हमेशा रुचि रहती है। अक्षरग्राम, मेरा पन्ना, रविरतलामी का हिन्दी ब्लॉग आदि चिट्ठे a to z पढ़ गया। काफी दिन से यह काम छूट गया। अभी आपका चिट्ठा, देवाशीष जी का तथा आलोक जी का चिट्ठा भी पढ़ना बाकी है। यकीन जानिए पुराने चिट्ठे पढ़कर यूं लगता है जैसे समय से होकर यात्रा कर रहे हों। कई बातों को पढ़कर बहुत मजा आता है। इसीलिए रविरतलामी जी कहते हैं कि चिट्ठा लिखकर हम इतिहास लिख रहे होते हैं।
आपकी पोस्ट नारद पर नहीं आई, पता नहीं क्यों। वो तो आज गूगल ब्लॉग सर्च में अपना नाम ढूंढ रहा था तो यहाँ पहुँच गया।
आपसे अनुरोध है कि कभी कभार एकाध पोस्ट लिख दिया कीजिएगा चाहे दो लाइनों की क्यों न हो। इससे ऐसा नहीं लगेगा कि आप हमसे दूर हैं। और हाँ तरुण भैया ने अनुगूंज का आयोजन किया है।
जीतू
फरवरी 27th, 2007 at 9:05 pm
3बहुत सही जवाब दिए, मिर्ची सेठ।
कहाँ गायब रहते हो भई। कभी कभी आ जाया करो, इधर भी।
सच पूछा जाए तो मिर्ची सेठ भी आलोक और देबू की तरह हिन्दी चिट्ठाकारी के प्रणेता है। आलोक ने जहाँ फोन्ट के पचड़े से हटकर यूनीकोड अपनाया, देबू ने उसे आगे बढाया, सामूहिक स्वरुप दिया। वही पंकज नरुला ( मिर्ची सेठ) ने हिन्दी चिट्ठाकारों के लिए वर्डप्रेस के दरवाजे खोले। मैने वर्डप्रेस के बारे मे सबसे पहले इनसे ही सुना। मेरे लिए वर्डप्रेस का सैट-अप करना, हर छोटी बड़ी परेशानी के लिए पंकज भाई ही हमारे गुरु ही थे। ना जाने इन्होने अपनी कितनी राते हिन्दी चिट्ठाकारों के सामूदायिक स्थलों के लिए काली की है।
इनका योगदान हिन्दी चिट्ठाकारी मे हमेशा याद रखा जाएगा।
आजकल पंकज काफ़ी व्यस्त रहते है, लेकिन मुझे आशा ही नही, वरन पूर्ण विश्वास है, जल्द ही वे हिन्दी चिट्ठाकारी मे सक्रिय रुप से भाग लेंगे।
संजय बेंगानी
फरवरी 27th, 2007 at 9:26 pm
4भला हो टैगींग का, सेठज, आपके दर्शन तो हुए.
सृजन शिल्पी
फरवरी 27th, 2007 at 11:23 pm
5नींव का पत्थर बनना बड़े नसीब की बात है, महल के कंगूरे पर तो कौए भी कांव-कांव कर लेते हैं। आप हिन्दी चिट्ठाकारी की नींव में जड़े उन नायाब पत्थरों में से हैं जिनके बल पर चिट्ठाकारी का यह भव्य महल खड़ा हुआ है। इसका साज-श्रृंगार करने वाले, झाड़-फानूस लगाने वाले आते रहेंगे। लेकिन जो काम आलोक जी, देबू दा, आप और जीतू भाई ने किया है, उसके बिना यह चिट्ठाकारी का मुकाम देख पाना मुमकिन न हो पाता।
आप समय निकालकर चिट्ठाकारी के रंगमंच पर कभी-कभार अपनी भूमिका को आगे बढ़ाने का प्रयास करते रहें।
रवि
फरवरी 28th, 2007 at 12:00 am
6इंटरनेटिया हिन्दी के लिए मिर्ची सेठ का योगदान तो अतुलनीय है ही. उन्होंने अपने गल्ले से अक्षरग्राम जैसे आयोजन के लिए अरसे से निष्काम भाव से पैसा लगाया है. तकनीकी सहयोग तो अपने स्तर पर सभी करते हैं.
Amit Gupta
फरवरी 28th, 2007 at 12:32 am
7खूब भालो, कैसे भी लिखा, लिखा तो सही!!
हिंदी ब्लॉगर
फरवरी 28th, 2007 at 2:09 am
8आपको जानता तो पहले से हूँ. चलिए, अब कुछ और जानकारी मिली.
नितिन
फरवरी 28th, 2007 at 3:08 am
9बहुत दिनों में आये लेकिन दुरुस्त आये। अच्छा लगा पढ कर।।
Srijan Shilpi » Blog Archive » मेरे जवाब भी हाजिर हैं
फरवरी 28th, 2007 at 1:40 pm
10[…] इंटरनेट और हिन्दी से जुड़े होने के बावजूद चिट्ठाकारी से काफी देर से जुड़ा, इसका भी कुछ अफसोस है। तकनीकी रूप से जागरूक नहीं होने के कारण ही यह देरी हुई। हालाँकि अपना डोमेन 2004 में ही रजिस्टर करा लिया था, लेकिन शुरुआत अंग्रेजी की साइट से की। बाद में हिन्दी का डायनेमिक फोण्ट भी बनवाया, लेकिन यूनिकोड का पता बाद में चला। आज ही मिर्ची सेठ की काफी अरसे बाद टैगिंग के इसी खेल के क्रम में पोस्ट देखी तो वहाँ मैंने यह टिप्पणी की: नींव का पत्थर बनना बड़े नसीब की बात है, महल के कंगूरे पर तो कौए भी कांव-कांव कर लेते हैं। आप हिन्दी चिट्ठाकारी की नींव में जड़े उन नायाब पत्थरों में से हैं जिनके बल पर चिट्ठाकारी का यह भव्य महल खड़ा हुआ है। इसका साज-श्रृंगार करने वाले, झाड़-फानूस लगाने वाले आते रहेंगे। लेकिन जो काम आलोक जी, देबू दा, आप और जीतू भाई ने किया है, उसके बिना चिट्ठाकारी का यह काम देख पाना मुमकिन न हो पाता। […]
देबाशीष
फरवरी 28th, 2007 at 9:41 pm
11मिर्ची सेठ के अंग्रेजी ब्लॉग पर हालिया प्रविष्टि से उम्मीद बंधी थी कि वे दुबारा लौट रहे हैं ब्लॉगलैंड में, यह पोस्ट देखकर सुखद अनुभव हुआ। पंकज ने अक्षरग्राम से जिस डोर में सब को पिरोया था मुझे लगता है कि थोड़ी मेहनत से उसे कसा का सकता है। सर्वज्ञ की भी हालत खस्ता है, मैं नया खाता बनाकर कर भी कुछ अपडेट नहीं कर सका, सेठ ध्यान दें ज़रा।
जीतू ने खूब कही, पंकज के साथ तुम लोगों ने निरंतर के लिये जब वर्डप्रेस विशेष निकाला था तब मेरी ही भी आँखें खुली थीं। हैरत होती है कि तब पंकज ने किस सरलता से मैट का का साक्षात्कार जुगाड़ लिया और जब हिन्दी वाले वर्डप्रेस से अंजान थे तब ये जानकारी उपलब्ध कराई।
कभी कभी दिया जलाने आ जाया करो यार
चौखट रोशन रहने दो लोग आते रहते हैं।
अतुल शर्मा
मार्च 3rd, 2007 at 2:06 am
12दिग्गजों मे बारे में जानना अच्छा लगता है।
RSS feed for comments on this post · ट्रैकबैक URI
Leave a reply
श्रेणियाँ
प्रविष्टियाँ
अन्य हिन्दी चिट्ठे
कड़ियाँ
स्वागतम्
टिप्पणियाँ
Meta
मिर्ची सेठ is proudly powered by WordPress - BloggingPro theme by: Design Disease