15
Jul
Posted by pankaj as अनुगूँज
लॉयन व गब्बर के डर से लिख रहा हूँ यह प्रविष्टि। भाया धंधो चोपट थोड़े ही करना है मन्ने। ते लो जी मिर्ची सेठ उर्फ पंकज भाई अंबाले वाले की चुटकला यज्ञ में आहूति
- संता बंता पेड़ पर बैठे हैं। बंता गाना गाना शुरु कर देता है। चार पांच गाने गाने के बाद वह थोड़ा चुप होता है व फिर चमगादड़ की तरह उलटा लटक कर फिर गाना शुरु कर देता है। संता पूछता है – ओ भाई की कर रिहा है। बंता – यार पहले साइ़ड ए के गा रहा था अब साइड बी के गाने गा रहा हूँ।
- दो लड़किया बातें कर रही हैं। ए शीना, ए शीना ते को पता है जब लड़किया बातें कर रही होती हैं तो लड़को के कान खड़े हो जाते हैं। दूसरी लड़की – हैं बहन उसे कान भी कहते हैं। (यह जोक बाहरवीं में हमारे दोस्तों जैसे कम्पयूटर के मास्टर जी ने सुनाया था)
- तमिल, गुजराती व पंजाबी इक्कठे काम करते हैं व रोज लंच पर मिलते हैं। तीनो एक ही तरह का खाना खा खा कर पक चुके होते हैं। तमिल कहता है कि गर कल फिर लंच में बीवी ने इडली रखी तो वह कूद कर जान दे दे गा। गुजराती कहता है कि अगर उसे फिर एक बार खाकरा खाने को मिला तो वह भी बनाने वाले के पास चला जाएगा। पंजाबी भी परांठों के बारे में यही विचार जाहिर करता हैं। अगले दिन तीनों मिलते हैं व लंच में वही देख कर तीनों कूद कर जान दे देते हैं। शम्शान में तीनों की बीवियाँ बात कर रही हैं। तमिल बीवी – हाय अगर मुझे पता होता कि ये इडली के कारण जान दे देंगे तो में उतपम्म बना कर भेजती। गुजराती – हाय मुझे भी खाकरा ले डूबा। हाय रे। आखिर में पंजाबी बीवी के चेहरे पर बहुत परेशानी के भाव हैं व वह कहती पर मेरे सरदार जी तो सुबह आप ही लंच बनाते थे।
- एक ग्रामीण शहर में आ कर घूम रहा है व घूमने के बाद थक कर कुछ खाने की जगह ढूढंता है। शहर के बाहर बाहर होने की वजह से वहाँ कुछ मिलता नहीं और वह भटकता हुआ कचहरी पहुँच जाता है। उसे कचहरी के बारे में जानकारी नहीं होती और व किसी जिरह चल रहे केस की कार्यवाही में पहुँत जाता है। कार्यवाही के दौरान शोर मचने पर जज चुप कराने के लिए कहता है – ऑडर ऑडर। अपना ग्रामीण भाई – हाँ हाँ दो कुलचे ते इक छोलयाँ दी प्लेट (यह मेरा बचपन का सबसे पहला याद किया चुटकला है)
- आजादी की लड़ाई के दिनों में महात्मा गाँधी के खादी प्रेम के चलते सभी को खादी ही प्रयोग करनी पड़ती थी। पंडित नेहरु को सर्दियों में लग गया जुकाम अब खादी का रुमाल होता है खुरदरा। बस जब नाक पोंछनी नाक पर खादी रेगमार जैसे काम करती। इस मारे नाक एक दम लाल हो गया। गाँधी जी ने नेहरु के लाल नाक को देख कर कहा कि – क्यूँ भई जूकाम कैसा है। नेहरु बोले – चिंता की बात नहीं आप के खादी के रुमालों से कुछ दिनों में नाक ही नहीं रहेगा फिर जुकाम ही न होगा।
वैसे तो पाँच ही लिखना चाहता था पर हरियाणा वासी हूँ इसलिए बोनस में एक हरियाणवी चुटकला भी बनता है
लाँग रुट की बस का कंडक्टर एक गाँव वालो से बड़ा परेशान था। गाँव वाले हाथ देकर अगले गाँव जाने के लिए भी बस रुकवा लेते थे जबकि वह बस का स्टॉप भी नहीं था। अब बस जा रही है व वह गाँव आने वाला है। कंडक्टर पीछे से ड्राइवर को आवाज लगाता है कि – रै भाई इब के ना रोकिए, कोई रस्ते माँ हो तो सालयाँ ने पेल दिए। ड्राइवर भी जोश में आकर गाड़ी की स्पीड बढ़ा देता है। फिर क्या देखता है की गाँव आने पर एक बुढ़िया एक छोटे से लड़के, जिस ने सिर्फ बुशर्ट ही पहन रखी है, के साथ सड़के के बीचो बीच खड़ी है। ड्राइवर को गाड़ी में ब्रेक लगानी पड़ी जाती है। ड्राइवर थोड़ा सा साइड मार कर अपनी खिड़की से सर निकाल कर गुस्से में पूछता है – रै माई कित जा गी। बुढ़िया – ना बेटे जाणा तो कोनी, बालक रोवे था इसने भोपूं बजा के दिखा दे।
11 Responses
नीरज त्रिपाठी
July 15th, 2006 at 6:59 pm
1मिर्ची सेठ
बोनस वाला हरियाणवी चुटकला बहुत मस्त है
रवि
July 15th, 2006 at 7:10 pm
2चलो, कोई तो डरा!
और डर कर हमें हँसा गया
SHUAIB
July 16th, 2006 at 2:02 am
3सेठजी, आपके चुटकुलों में किसी मे मिर्ची लगी तो किसी मे नही
अवलोकन - चुटकुलों की 21 वीं अनुगूंज at अक्षरग्राम
July 20th, 2006 at 12:54 am
4[...] चुटकुलों के कुछ मंतव्य ने भी बहुत आनंद प्रदान किया, और होठों पर हँसी वापस आई. मिर्ची सेठ यानी की पंकज भाई अंबाले वाले मिर्ची बेचना छोड़ चुटकुला बेचते दिखाई दिए. मेरा पन्ना की दुकान के कुछ भयंकर मीठे चुटकुले पढ़ने के बाद तो हँसी रोकने का चूरन लेना पड़ा. फुरसतिया कुछ प्राचीन, वजनदार चुटकुले ढूंढ लाए. खाली पीली चुटकुलों की गूंज भी धमाकेदार रही. चुटकुलों के दो – दो दस्तक बड़े हास्यास्प्रद रहे. प्रतिभास ने एक नहीं, दो नहीं, बल्कि तीन – तीन दफ़ा हँसाने की कोशिशें कीं. चुटकुलों की कुलबुलाहट तो भई, खूब रही. छाया के दो दो ठहाके बड़े मस्त मस्त रहे. इन्द्रधनुष के चुटकुले, जाहिर है रंगीन ही रहे. इस बीच छींटें और बौछारें तथा रचनाकार पर क्रमशः चुटकुलों की बौछारों और रचनाओं का दौर जारी था. कुल मिलाकर हजार से ऊपर चुटकुले अंततः सुन-सुना ही लिए गए. [...]
saraj
May 4th, 2007 at 2:54 am
5मिर्ची सेठ
बोनस वाला हरियाणवी चुटकला बहुत मस्त है
अवतार सिॅह
August 26th, 2008 at 9:29 pm
6सेठ जी हरियाणवी चुटकले में मज़ा आ गया
NItesh Kumar
November 15th, 2008 at 1:42 am
7Mazza AA Gaya Bhai Mirchi Seth
SHIV
May 1st, 2009 at 1:26 pm
8kan khada ho gaya
Abhishek Pandey
May 14th, 2009 at 11:53 pm
9aap ka santa banta ki churkulla bahut hi accha hi aap isi tarh chutkulle screen per diya kren
Abhishek Pandey
May 14th, 2009 at 11:55 pm
10aap ka santa banta ki churkulla bahut hi accha hi aap isi tarh chutkulle screen per diya kren
Abhishek pandey
vill-hajirwa po-bithria kalan
diss.siddarth nagar (u.p.)
Ganesh jogi
May 28th, 2009 at 1:00 am
11संता बंता पेड़ पर बैठे हैं। बंता गाना गाना शुरु कर देता है। चार पांच गाने गाने के बाद वह थोड़ा चुप होता है व फिर चमगादड़ की तरह उलटा लटक कर फिर गाना शुरु कर देता है। संता पूछता है – ओ भाई की कर रिहा है। बंता – यार पहले साइ़ड ए के गा रहा था अब साइड बी के गाने गा रहा हूँ।
दो लड़किया बातें कर रही हैं। ए शीना, ए शीना ते को पता है जब लड़किया बातें कर रही होती हैं तो लड़को के कान खड़े हो जाते हैं। दूसरी लड़की – हैं बहन उसे कान भी कहते हैं। (यह जोक बाहरवीं में हमारे दोस्तों जैसे कम्पयूटर के मास्टर जी ने सुनाया था)
तमिल, गुजराती व पंजाबी इक्कठे काम करते हैं व रोज लंच पर मिलते हैं। तीनो एक ही तरह का खाना खा खा कर पक चुके होते हैं। तमिल कहता है कि गर कल फिर लंच में बीवी ने इडली रखी तो वह कूद कर जान दे दे गा। गुजराती कहता है कि अगर उसे फिर एक बार खाकरा खाने को मिला तो वह भी बनाने वाले के पास चला जाएगा। पंजाबी भी परांठों के बारे में यही विचार जाहिर करता हैं। अगले दिन तीनों मिलते हैं व लंच में वही देख कर तीनों कूद कर जान दे देते हैं। शम्शान में तीनों की बीवियाँ बात कर रही हैं। तमिल बीवी – हाय अगर मुझे पता होता कि ये इडली के कारण जान दे देंगे तो में उतपम्म बना कर भेजती। गुजराती – हाय मुझे भी खाकरा ले डूबा। हाय रे। आखिर में पंजाबी बीवी के चेहरे पर बहुत परेशानी के भाव हैं व वह कहती पर मेरे सरदार जी तो सुबह आप ही लंच बनाते थे।
एक ग्रामीण शहर में आ कर घूम रहा है व घूमने के बाद थक कर कुछ खाने की जगह ढूढंता है। शहर के बाहर बाहर होने की वजह से वहाँ कुछ मिलता नहीं और वह भटकता हुआ कचहरी पहुँच जाता है। उसे कचहरी के बारे में जानकारी नहीं होती और व किसी जिरह चल रहे केस की कार्यवाही में पहुँत जाता है। कार्यवाही के दौरान शोर मचने पर जज चुप कराने के लिए कहता है – ऑडर ऑडर। अपना ग्रामीण भाई – हाँ हाँ दो कुलचे ते इक छोलयाँ दी प्लेट (यह मेरा बचपन का सबसे पहला याद किया चुटकला है)
आजादी की लड़ाई के दिनों में महात्मा गाँधी के खादी प्रेम के चलते सभी को खादी ही प्रयोग करनी पड़ती थी। पंडित नेहरु को सर्दियों में लग गया जुकाम अब खादी का रुमाल होता है खुरदरा। बस जब नाक पोंछनी नाक पर खादी रेगमार जैसे काम करती। इस मारे नाक एक दम लाल हो गया। गाँधी जी ने नेहरु के लाल नाक को देख कर कहा कि – क्यूँ भई जूकाम कैसा है। नेहरु बोले – चिंता की बात नहीं आप के खादी के रुमालों से कुछ दिनों में नाक ही नहीं रहेगा फिर जुकाम ही न होगा।
वैसे तो पाँच ही लिखना चाहता था पर हरियाणा वासी हूँ इसलिए बोनस में एक हरियाणवी चुटकला भी बनता है
लाँग रुट की बस का कंडक्टर एक गाँव वालो से बड़ा परेशान था। गाँव वाले हाथ देकर अगले गाँव जाने के लिए भी बस रुकवा लेते थे जबकि वह बस का स्टॉप भी नहीं था। अब बस जा रही है व वह गाँव आने वाला है। कंडक्टर पीछे से ड्राइवर को आवाज लगाता है कि – रै भाई इब के ना रोकिए, कोई रस्ते माँ हो तो सालयाँ ने पेल दिए। ड्राइवर भी जोश में आकर गाड़ी की स्पीड बढ़ा देता है। फिर क्या देखता है की गाँव आने पर एक बुढ़िया एक छोटे से लड़के, जिस ने सिर्फ बुशर्ट ही पहन रखी है, के साथ सड़के के बीचो बीच खड़ी है। ड्राइवर को गाड़ी में ब्रेक लगानी पड़ी जाती है। ड्राइवर थोड़ा सा साइड मार कर अपनी खिड़की से सर निकाल कर गुस्से में पूछता है – रै माई कित जा गी। बुढ़िया – ना बेटे जाणा तो कोनी, बालक रोवे था इसने भोपूं बजा के दिखा दे।
8 Responses
नीरज त्रिपाठी
जुलाई 15th, 2006 at 6:59 pm
1
मिर्ची सेठ
बोनस वाला हरियाणवी चुटकला बहुत मस्त है
रवि
जुलाई 15th, 2006 at 7:10 pm
2
चलो, कोई तो डरा!
और डर कर हमें हँसा गया
SHUAIB
जुलाई 16th, 2006 at 2:02 am
3
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