मेरे एक परम मित्र हैं शादीशुदा हैं व आजकल काम के सिलसिले में चेन्नई गए हुए हैं। भाभी जी यहाँ हैं व वे वहाँ हैं। अब प्रिया बिना दिल नहीं लागे रे व विरहयोग में फिर से कवि बन बैठे हैं। देखिए उनकी लेखनी
चाँद को देख कर चाँद याद आता है क्या कहें चाँद को छू लेने को जी चाहता है क्या कहें तारे तो बहुत हैं पर चाँद तो एक ही है चाँदनी में डूब जाने को जी चाहता है क्या कहें हमारा चाँद भी पास होता तो बात थी बहुत दूर है हमसे अभी क्या कहें तन्हा बैठे चाँद निहारते हैं क्या कहें इस चाँद में भी वही चाँद नजर आता है क्या कहें चाँद की मस्ती की बात करता है चकोर चकोर बन जाने को जी चाहता है क्या कहें आप रात में ही चाँद देखते होंगे हमें तो दिन में भी नजर आता है चांद क्या कहें चाँद के पास भी तपिश तो होती है उस तपिश के लिये भी जी ललचाता है क्या कहें तपिश ऐसी जो जला दे सब कुछ उसी तपिश में जल जाने को जी चाहता है क्या कहें चाँद में भी दाग ढ़ूढ़ लेते हैं लोग हमें तो नजर नहीं आता है क्या कहें दाग तो हम में भी एक हजार होंगे हमारा चाँद कभी नहीं जताता क्या कहें चाँद तो बेदाग है दाग हम हैं चाँद को टीका लगाने को जी चाहता है क्या कहें तुम पर लगे इस टीके की कसम ऐ चाँद किसी की नजर न लगने देंगे तुम्हें
जब मेरे मित्र वापिस आएंगे तो उन्हें हवाई अड्डे पर लेने मुझे ही जाना है। उनके अनुसार यदि कविता न भी अच्छी लगे तो एयरपोर्ट पर जरुर लेने पहुँच जाऊं फिर कभी नहीं लिखेंगे। आप क्या कहते हैं लेने जाऊं कि नहीं…
12 Responses
समीर लाल
मई 14th, 2006 at 11:29 am
1अरे पंकज भाई,
जरुर जायें और रचना की तारीफ़ हमारी तरफ़ से भी कर दिजियेगा.
समीर लाल
अनूप शुक्ला
मई 14th, 2006 at 11:40 am
2चले जाओ। मिलने पर कहना -क्या लिखते हैं आप! दोनों बातें प्रकट होती हैं। बहुत अच्छी लिखी है। तथा यह भी कि क्या कूडा़ कविता लिखते हैं।इससे अच्छी तो हमारे जीतू लिख सकते हैं अगर कुछ समझ में न आये तो!
pankaj
मई 14th, 2006 at 11:50 am
3शुक्ला जी,
जीतू से मौज न लीजिएगा। परिचर्चा के कमरों में कमर कस कर बैठे हैं कहीं अंदर न आने दिया तो…
उन्मुक्त
मई 14th, 2006 at 5:41 pm
4जरूर जांये सुना है कि अमेरिका मे टैक्सी बहुत मंहगी है|
pankaj
मई 14th, 2006 at 5:48 pm
5खासकर जब रास्ता 50 मील का हो
संजय बेंगाणी
मई 14th, 2006 at 8:11 pm
6शब्दो को मत देखो, भावनाओं को देखो. आप अपने मित्र को लेने जरूर जायें और सम्भव हो तो साथ में उनकि पत्नि को भी ले जाये.
हम भी तारिफ़ करते हैं उनकि इस अकविता कि.
जीतू
मई 14th, 2006 at 8:51 pm
7ये शुकुल का भी मन हमारे बिना लगता ही नही, हर जगह हमें घसीट लेता है, शुकुल भाई, अब तैयार रहो, मै पूरे साल भर से लिखी पकाऊ कविता का स्टाक लेकर आ रहा हूँ, सामने बैठकर सुनाऊंगा, और वाह वाह भी करवाऊंगा, फिर देखते हैं कहाँ भागते हो।
ratna
मई 15th, 2006 at 12:07 am
8आप सब की बेंतबाज़ी में दखलन्दाज़ी की माफी । पर कविता अच्छी है । पत्नी बिना काँजीवरम साड़ी के भी खुश हो जाएगी ।
e-shadow
मई 15th, 2006 at 11:11 am
9जरूर जाइये सरकार, दोस्ती कविता से बहुत ऊपर नही है क्या?
विवेक सेठी
मई 23rd, 2006 at 6:33 pm
10जिन भाईओं और बहनों को पसंद नहीं आई, उन्हें शायद ये जान कर तसल्ली हो कि मैं रोज नहीं लिखता, ये कविता का शौक तो ५ ६ साल से खत्म हो गया था, ये तो यूं ही निकल गयी थी।
घबराएँ नहीं, रोज नहीं झेलना पड़ेगा।
pankaj
मई 23rd, 2006 at 6:56 pm
11और इनकी शादी को भी ६-७ साल हुए हैं।
Krishna
मई 25th, 2006 at 8:08 am
12bahooth acha
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