अनूप जी उर्फ फुरसतिया जी समय समय पर फूल व फुलझड़ियाँ छोड़ते रहते हैं। ताजा अंक है कविता जरुरत क्या थी जिसमें उनकी इनायत सभी चिट्ठाकारो पर हुई है। कविता का दूसरा पैरा बहुत ही जोरदार है जो की जरुरत की हिसाब से हर जगह फिट कर सकते हैं
हम तो उंनीदे थे बढ़िया लिखने के गुमानी-गलीचे पे
इस खुशनुमा नींद से झकझोर के जगाने की जरूरत क्या थी?
शुक्ला जी यूँ ही लिखते रहिए चाहे गुमानी नशे में ही सही।
One Response
अनूप शुक्ला
अप्रैल 6th, 2006 at 9:37 pm
1हम तो लिखते ही रहते हैं ‘बस यूं हीं’ लगातार
फिर से लिखने को उकसाने की जरूरत क्या थी?
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