बचपन में जब भारत एक खोज आता था तो उसके आरंभ में आने वाला गीत बड़ा सही लगता था। सुनने में अच्छा था और बोल मुंह पर चढ़ भी गए थे। यहाँ आने के बात वह गीत के बारे में याद तो था पर उस से अधिक कुछ नहीं। फिर घूमते घूमते “Hymn of Creation” के बारे में पता चला व यह भी पता चला की यहाँ पाश्चातय जगत में ऋग्वेद की सबसे प्रसिद्ध श्रुति भी यही है। अंतर्जाल पर जाकर इसका अंग्रेजी रुपांतर पढ़ा तो लगा कि क्या बढ़िया लिखा है। फिर ध्यान आया कि भारत एक खोज वाला गीत इसका हिन्दी रुपांतर है। खोज शुरु हुई पर मिला नहीं। कल राहुल की इमेल आई तो उसने विवेक राय के सजाल के बारे में बताया जहाँ उन्होंने अंग्रेजी वाली हिन्दी में इसे लिखा हुआ था चुंकि देवनागरी में लिखा और भी सुन्दर लगेगा लीजिए
ऋग्वेद(१०:१२९) से सृष्टि सृजन की यह श्रुत
| सृष्टि से पहले सत नहीं था, असत भी नहीं अंतरिक्ष भी नहीं, आकाश भी नहीं था छिपा था क्या कहाँ, किसने देखा था उस पल तो अगम, अटल जल भी कहाँ था सृष्टि का कौन है कर्ता कर्ता है यह वा अकर्ता वो था ह्रन्यगर्भ सृष्टि से पहले विद्यमान जिस के बल पर तेजोमय है अम्बर गर्भ में अपने अग्नि धारण कर पैदा कर ओम! सृष्टि निर्माता स्वर्ग रचियता पुर्वज रक्षा कर |
Neither non-being nor being was as yet, Neither was airy space nor heavens beyond; What was enveloped? And where? Sheltered by whom? And was there water? Bottomless, unfathomed?Neither was there death nor immortality, Nor was there any sign then of night or day; Totally windless, by itself, the One breathed; Beyond that, indeed, nothing whatever was.In the Principle darkness concealed darkness; Undifferentiated surge was this whole world. The pregnant point covered by the form matrix, From conscious fervor, mightily, brought forth the One.In the Principle, thereupon, rose desire, Which of consciousness was the primeval seed. Then the wise, searching within their hearts perceived That in non-being lay the bond of being.Stretched crosswise was their line, a ray of glory. Was there a below? And was there an above? There were sowers of seeds and forces of might: Potency from beneath and from on high the Will. Who really knows, who could here proclaim This flow of creation, from where it did arise, |
14 Responses
विजय वडनेरे
March 11th, 2006 at 12:46 am
1वाह!
याद ना जाये, बीते दिनों की,
जा के ना आए जो दिन,
दिल क्यों भुलाये, उन्हें, दिल क्यों भुलाये…
मजा ला दिया आपने, ये टाईटल गीत सुना (पढा) कर,
यह कार्यक्रम तो मेरे काफ़ी पसन्दीदा कार्यक्रमों में से एक हुआ करता था.
और फ़िर “ओमपूरी” की आवाज और वो “रोशन सेठ” का जवाहर लाल नेहरु बन कर आना…!!
“याद आ गया मुझको-गुजरा जमाना…”
धन्यवाद!
pankaj
March 11th, 2006 at 1:08 am
2शुक्रिया विजय जी। पर यदि आप गौर करें अंग्रेजी संस्करण हिन्दी से कहीं अच्छा अनुवादित है।
पंकज
sanjay | जोगलिखी
March 11th, 2006 at 1:30 am
3बहुत खुब. पढते समय लगा मानो वही गीत पार्श्व में बजने लगा हैं.
Amit
March 11th, 2006 at 3:19 am
4वाह, बीते दिनों की याद दिला दी। “भारत एक खोज” मैं भी देखता था और मुझे बहुत पसंद भी था।
जीतू
March 11th, 2006 at 7:56 am
5वाह वाह, पंकज भाई,
फिर से गाना याद करवा दिया।
एक और टाइटिल सांग था, बहुत अच्छा लगता था, मोगली वाला
जंगल जंगल पता चला है, पता चला है एक
चड्डी पहन के फूल खिला है फूल खिला है…
अरे चड्डी पहन के फूल खिला है फूल खिला है…
नीरज शौकीन
March 11th, 2006 at 10:52 am
6अति उत्त्म
Pratik Pandey
March 11th, 2006 at 11:07 am
7यह सूक्त ‘नासदीय सूक्त’ कहलाता है। मेरे ख़्याल से हिन्दी अनुवाद में जहाँ ‘अवि’ शब्द का इस्तेमाल है, उसकी जगह ‘हवि’ होना चाहिए।
आशीष
March 12th, 2006 at 8:08 pm
8पंकज भाई,
बहूत बहूत धन्यवाद, काफी दिनो से ढुण्ढ रहा था इसे मै. मिल नही पा रहा था.
आशीष
pratyaksha
March 12th, 2006 at 9:36 pm
9वाह ! मज़ा आ गया.
भारत एक खोज बहुत पसंदीदा कार्यक्रम हुआ करता था . खासकर इतिहास की छात्रा रही तो इसलिये और भी अच्छा लगता था. और टाइटल गीत, जो ऋग्वेद की सबसे प्रसिद्ध श्रुति है, बहुत अच्छा लगता था , शब्द , अर्थ और लय सब बाँधते थे.
आज इसे पढ कर बहुत ही अच्छा लगा. शुक्रिया
फ़ुरसतिया » भौंरे ने कहा कलियों से
March 14th, 2006 at 1:27 pm
10[...] पंकज नरुला:- मिर्ची सेठ ने किया ये तो बड़ा कमाल, मिर्च बेचना त्यागकर, लिया सृष्टि का हाल। [...]
ajay hada
October 15th, 2006 at 11:06 pm
11भारत एक खोज) ko mai bahu dino sai net par search kar raha tha ant mai muzhai aaj mil gaya.
ुउदयराज
May 18th, 2007 at 3:40 am
12शायद विकीपीडीया पर मौजूद यह शिर्षक गीत ज्यादा सही है।
सृष्टि से पेहले सत नहीं था, असत भी नहीं।
अंतरिक्ष भी नहीं, आकाश भी नहीं था।
छिपा था क्या, कहाँ, किसने ढका था।
उस पल तो अगम, अटल जल भी कहाँ था ?
सृष्टि का कौन हैं करता।
करता है वा अकरता।
ऊँचे आकाश में रहता।
सदा अध्यक्ष बना रहता।
वहीं सचमुच में जानता, या नहीं भी जानता।
हैं किसी को नहीं पता, नहीं पता,नहीं हैं पता, नहीं हैं पता।
Debashish
August 4th, 2007 at 7:53 pm
13Opening sequence YouTube per hei http://www.youtube.com/watch?v=vBbSbCczYeM
Sushant Pandit
December 28th, 2009 at 7:16 am
14Aapka yeh webpage bahut gyanmay hei. Meri jigyansa Bharatiya sabhyata aur dharm aaramv hui Nasadiya sukta se hi. Iss sukta mein choopa hei ‘amartya’ amrit. Dhanyavad.
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