स्वामी जी की अति-आदर्शवाद अनुगूँज प्रविष्टि में दी गई छवि जिस में कच्ची मिट्टी से कुम्हार घड़ा बना रहा है बड़ी ही उपयुक्त है। कच्ची मिट्टी यानि बच्चे जो कि भविष्य हैं का बनना इस बात पर निर्भर करता है कि कुम्हार रुपी माँ बाप उसे कैसे ढालते हैं। उपमा सही बन पड़ी है, इस बात में दम भी बहुत है। पर मानव की संतान और मटके में फर्क भी है। सबसे बड़ा कि मटका जड़ है व मानव चेतन है। मटका एक बार बन गया तो वह उसकी नियति है पर मानव समय के साथ साथ बदलता रहता है। लेकिन इस बात में कोई शक नहीं कि प्रारम्भिक शिक्षा व जिस ढांचे में आप डाल दिए जाते हो, आपके भविष्य की दिशा को निर्धारित करने में बहुत प्रभावी होता है।
तो क्या यह जरुरी है कि जो चीजे आचार व्यवहार आगे आकर मनुष्य की व्यक्तिगत व आर्थिक उन्नति के लिए आवश्यक हैं शुरु से ही सिखाई जाए? यह आचार व्यवहार क्या हैं? यह बात तो पक्की है कि आप अपने बच्चों को सही बातें ही सीखाना चाहोगे। कुछ बातें सार्वभौमिक सत्य होती हैं। जैसे कि किसी की अकारण हत्या करना गलत है, चोरी करना ठीक नहीं है और कुछ सामान्य व्यवहार में प्रयोग होने वाली बातें जैसे कि झूठ बोलना गलत है, किसी को तंग करना अच्छी नहीं इत्यादि। सार्वभौमिक सत्य हमेंशा से हर समाज में सत्य रही हैं। हालांकि आप किन कारणों में हत्या गलत नहीं हैं पर चर्चा कर सकते हैं। पर हम अभी के लिए यह चर्चा फिर कभी के लिए रखते हैं। पर सामान्य व्यवहार की सीखों को हम रोजमर्रा की जिंदगी में ताक पर रख कर अपने फायदे की बात करते हैं। तो क्या बच्चों के ये बाते सीखाना बेमानी है? नहीं कभी नहीं। बच्चों को आप सदियों से सही माने जाने वाली बातें ही सीखाओगे। समय के साथ जब उनमें अच्छे बुरे को पहचानने की क्षमता आ जाएगी वे अपने आप ही अपना रास्ता ढूंढ लेंगे।
अब आते हैं ऐसी कौन सी बाते हैं जो मुझे लगती हैं जो मुझे समय के साथ साथ सीखते हुए बदलनी पड़ी। पहली यह कि सिर नीचे करके गधे की तरह मेहनत करते रहो परिणाम अपने आप अच्छे आ जाएंगे। मेहनत वाली बात ठीक थी पर गधे की तरह नहीं। आज के स्पर्धा भरे युग में कोई भी आपको बिना मांगे कुछ नहीं देता। गर आप सोचते हैं कि कम्पनी में मेहनत करते रहें और अच्छी चीजें आपके साथ होती रहेंगी तो आप गलती पर हैं। देवता जैसा आपका मैनजर हो वाली स्थिति को छोड़ कर आपको अपनी उन्नति के लिए स्वयं ही कुछ करना पड़ेगा। तो गर जिंदगी बिगड़ा हुआ बैल है तो इसे सींगों से पकड़कर अपने बस में करो। बैठे रहने से कुछ न होगा। कर्म करो और दिमाग से। दूसरी चीज जिससे अभी भी लड़ना पड़ता है कुछ भी कर के आगे बढ़ने की प्रवृत्ति की जगह सर्वे भवन्ति सुखिनः। आगे बढ़ने के लिए अपने सामने वाले की बर्बादी का मंजर सोचना अजीब लगता है। पर कम्पनियों में ऐसा खूब होता है। आज के जमाने में समाजवादी नीतियों की कम्पनियों कोई जगह नहीं। मरने मारने से डरना व्यर्थ है गर सामने वाला समझदार है तो वह बचेगा नहीं तो उसे धंधें में रहने की जरुरत नहीं।
7 Responses
eswami
दिसम्बर 13th, 2005 at 7:57 am
1पंकज भाई,
आप सारगर्भित लिखते हैं और विषय का मर्म समझते हैं. इस बार गागर मे सागर भरी है. व्यर्थ शाब्दिक आडंबर से दूर यह सहज शैली बहुत प्रिय है. मुझे आपका ये लेख बहुत अच्छा लगा.
मिर्चीसेठ
दिसम्बर 13th, 2005 at 9:32 pm
2स्वामी जी, अजी आप जैसे कद्रदानों की वजह से ही लिखते हैं नहीं तो हम तो कब के छोड़ छाड़ के वेगास चले गए होते। मिर्ची सेठ
अक्षरग्राम » Blog Archive » आवलोकन अनुगूंज १६: (अति)आदर्शवादी संस्कार सही या गलत?
दिसम्बर 17th, 2005 at 3:23 pm
3[…] भाई पंकज नरूला यानी http://ms.pnarula.com/200512/%e0%a4%86%e0%a4%a6%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b6%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a6/”>मिर्ची सेठ के लेख में सौंधी खुशबू है, बालमन की कच्ची मिट्टी को गढने में कितनी सावधानी लगती है इसकी समझ भी और फ़िर मिट्टी के मानुस को कैसे फ़ौलादी इरादे कामयाब बनाते हैं इसका भान भी है उन्हें - अब आते हैं ऐसी कौन सी बाते हैं जो मुझे लगती हैं जो मुझे समय के साथ साथ सीखते हुए बदलनी पड़ी। पहली यह कि सिर नीचे करके गधे की तरह मेहनत करते रहो परिणाम अपने आप अच्छे आ जाएंगे। मेहनत वाली बात ठीक थी पर गधे की तरह नहीं। आज के स्पर्धा भरे युग में कोई भी आपको बिना मांगे कुछ नहीं देता। गर आप सोचते हैं कि कम्पनी में मेहनत करते रहें और अच्छी चीजें आपके साथ होती रहेंगी तो आप गलती पर हैं। देवता जैसा आपका मैनजर हो वाली स्थिति को छोड़ कर आपको अपनी उन्नति के लिए स्वयं ही कुछ करना पड़ेगा। तो गर जिंदगी बिगड़ा हुआ बैल है तो इसे सींगों से पकड़कर अपने बस में करो। […]
आलोक पुराणिक
दिसम्बर 23rd, 2005 at 8:56 am
4मिर्ची सेठ
धन्यवाद, प्रपंचंतंत्र पर कुछ नयी कहानियां डाली हैं, देखिये और कमेंटिये।
आपका आलोक पुराणिक
JAY PRAKASH MANASH
दिसम्बर 30th, 2005 at 10:38 am
5DEAR MIRCHI SETH,
BHAI SACHMUCH MAZA AA GAYA AAPSE MILKAR, YANI AAPKI HINDI LEKHAN SE GUJAR KAR. AAP HINDI PREMI HAIN BHAHUT HI SUKH HUA YAH JANKAR,AAP BIDESH MEIN BHI RAH KAR HINDI GANGA KE LIYE KARYA KAR RAHEIN HAI. ISKO MAI AAPKA PUNYA KARYA KAHNA CHAHTA HOON. MAI CHAHUNGA KI AAP MERI SITE SE GUJAREN EK BAR SAYAD BHARAT MATA KI ASLI PICTURE DIKHAI DEGI AAPKO MERE LALIT NIBANDHO MEIN. SITE HAI: www.jayprakashmanas.info
Mrs. Renu Ahuja
जनवरी 20th, 2006 at 6:31 am
6Namstey, Mirchee Seth oorf Pankaj Narulaa jee,
aapkey iss ATIAADARSHWAAD kee anugoonj me jab aap kehtey hai kee matkaa jad hai, aur manav chetan hai to saath hee iss baat ko bhee sweekar kartey ho kee prarmbhik shikshaa aapkey jeevan kee dishaa nirdharit kartee hai, yaani aap jahaa is Materilastic Wold me ek taraf aaj kee swaarthipaney se takkar leney kee baat kartey ho wahi, ye bhee maantey ho kee achey jeevan aadarsh bhee bhoolaye nahi jaa saktey, maanaa kee aajkal companiyon me ye sab badey zoron per chal rahaa hai, magar inhee companiyon me kaam karney waaley log insaan hee hai, zaroorat sirf swarth key maadey nazar oonhey pichey dhakelney kee hee nahi hai, balkee waqt padney per agar oon logon ko aap zaraa haath badaa kar sahara den to wo saamney waaley ke barey me pooree dharnaa hee badal letey hai, Halaakee hotaa to kam hai, magar hota hai aisaa, yahi bas yahi aakar jeet jaatey hai, sanskaar hamarey aur tumhaarey..HINDUSTANIYAT key. Magar aapkaa lekh zindgee ke kareeb hai, do keep writing.It was just a matter of chance that while reading the blog of Alok Puranik jee, I have come accross your blog too, its nice one indeed.Apkey lekhan ke liye shubhkaamnayen.
Renu Ahuja, http://kavyagagan.blogspot.com
नितिन
फरवरी 26th, 2006 at 5:33 pm
7मिर्ची सेठ,
आप बहुत सुन्दर लिखते हैं।
शुभकामनायें
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