बाहर रहते हुए कभी कभी कुछ विचार आते हैं जो कि मन को सालते हैं । व्यक्तिगत स्तर पर घर संबधियों की चिंता, क्या मैं एक अच्छा भाई, बेटा साबित हो रहा हूँ इत्यादि। इस स्तर से उठते हुए राष्ट्रीय स्तर पर यहां रहते हुए मैं देश के लिए क्या कर रहा हूँ। खासकर जब आप जानते हैं कि आप आज जहाँ है वहां आप शिक्षा की वजह से ही हैं। शिक्षा के लिए तो देश का ऋणी ताजिंदगी रहना पड़ेगा। खासकर अतानू डे का हू एक्चुली पेड फॉर माई ऐजूकेशन(आखिर मेरी पढ़ाई के पैसे किसने दिए) पढ़ने के बाद। इस विचारावस्था से निकलने के दो उपाय जो हमेशा सोचता हूँ वे इस प्रकार हैं
With the number of migrants worldwide now reaching almost 200 million, their productivity and earnings are a powerful force for poverty reduction. Remittances, in particular, are an important way out of extreme poverty for a large number of people. The challenge facing policymakers is to fully achieve the potential economic benefits of migration, while managing the associated social and political implications.
पर फिर भी इस पंछी को चैन तो वापिस जहाज पर जाकर ही आएगा। वह सुबह कभी तो आएगी।
अभी तो दादा बड़ा न भैया
सबसे बड़ा रुपइया
आप अगर बाहर रहते हैं व ऐसे विचार आप को तंग करते हैं तो आप मन को कैसे समझाते हैं या फिर आप के दिल को बहलाने को मिर्ची कौन सा ख्याल अच्छा है।
6 Responses
सुनील
नवम्बर 20th, 2005 at 1:44 am
1पंकज जी बात तो बिल्कुल सही उठायी है, किसी भी क्षेत्र में हों हम, अक्सर यह सवाल तो मन में अवश्य उठता होगा पर उत्तर लिखने के लिए तो पूरा चिट्या लिखना पड़ेगा.
सुनील
जीतू
नवम्बर 20th, 2005 at 2:07 am
2सच है और परिवार की याद तीज त्योहार पर सबसे ज्यादा आती है।
भैया, अपन तो कुवैत मे रम गये है। पूरी की पूरी दुनिया बसा डाली है यहाँ।यहाँ पर इन्डियन कम्यूनिटी बहुत ज्यादा एक्टिव है, हम लोग हर त्योहार बड़े जोशोखरोश से मनाते है, इवेन वो वाले त्योहार भी जो, भारत मे कभी नही मनाते थे। लेकिन जब मन ज्यादा उदास हो जाता है, तो उठाते है टीमटामड़ा और मुँह उठाकर निकल पड़ते है हिन्दुस्तान की ओर।
धरणी धर द्विवेदी
नवम्बर 20th, 2005 at 10:41 am
3भैया काहे को इमोशनल करते हो। अभी कुछ महीने पहले ही तो भारत से वापस आया हूं। सच लिखा है कि देश में रह कर देश की सेवा हो सकती थी…और जहां तक पैसे का सवाल है…मेरा रियल लाइफ एक्स्पीरिएंस मानो कि भारत में भी बहुत पैसा है…सिर्फ सॉफ्ट्वेयर में ही नहीं, अन्य क्षेत्रों में भी। अमेरिका की अपेक्षा पैसे की बचत भी अधिक अनुपात में होती है। थोड़ा व्यवस्था के सुधरने की देर है..वरना अब तो वहां भी सब कुछ हो गया है।
pankaj
नवम्बर 20th, 2005 at 8:54 pm
4जीतू जी: इस तरह से तो मुझे शिकायत करना भी नहीं बनता। यहाँ सिलकन वैली में इतने भारतीय हैं कि कई बार अमरीकी विदेशी लगने लगते हैं। पर आप जानते हैं कि पर तो होगा। होली दिवाली पर जो बाजारों के रंग बदल जाते हैं वे यहाँ कहाँ। दूसरा यहाँ रहते हुए जो बुरा लगा अभी बड़े भैया कि आँख में कुछ तकलीफ थी व एक छोटा सा आपरेशन हुआ जो कि भगवान व डॉक्टर की कृपा से सफल रहा। इस पूरी अवधि के दौरान बुरा लगा कि जब अपने तकलीफ में हैं तो आप वहाँ पहुँच नहीं सकते।
सुनील जी आपकी प्रविष्टि का इंतजार रहेगा।
धरणी जी आपकी बात में दम है जरा तफसील से लिखिए चिट्ठे पर हो सकता है दो चार वही पढ़के प्रेरणा पा लें।
आलोक कुमार
नवम्बर 20th, 2005 at 10:13 pm
5मुझे लगता है कि किसी चीज़ को तो बलि चढ़ना ही होगी। अङ्ग्रेज़ लोगों ने पूरी दुनिया पर राज किया, तो यह तो नहीं सोचा कि उनके परिवार वाले कैसे हैं और क्या कर रहे हैं।
हिमाचल वगैरह में आदमी लोग मैदानों में काम करने जाते ही हैं, परिवार को छोड़ के।
मुझे बङ्गलोर में रह के भी लगता है कि घर वालों के लिए कुछ नहीं कर पा रहा, जो कि दिल्ली, लखनऊ या फिर हैदराबाद में हैं।
मुझे नहीं लगता कि देसी प्रोग्रामरों के लिए हिन्दुस्तान में पैसे की कमी होगी। हाँ, उतना तो नहीं होगा जितना अमेरिका में, लेकिन दूसरे फ़ायदे हैं।
हाँ ये बात ज़रूर खटक सकती है कि अगली पीढ़ी क्या होगी, क्या करेगी? लेकिन हरेक पीढ़ी के अपने रास्ते होते हैं, कुछ लोग भारत में रह के भी विदेशी समान हैं।
भाषा, वेशभूषा और लहज़े के आवरण से परे हो कर विचारना वाञ्छनीय है।
इतना निश्चित है कि सब कुछ नहीं मिल सकता। क्या छोड़ें और क्या रखें, यह निर्णय वास्तव में आपके हाथ में है। जी हाँ, है। इस बात को ध्यान में रखें।
Brij
दिसम्बर 16th, 2005 at 10:50 am
6Well written, frequent trips to country can lessen the pain (if I am using the right word !)
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