आज घूमते घूमते विष्णूलोकम् पहुँच गए। वहीं मधुशाला कि इन सुंदर पंक्तियों को वाचन किया तो सोचा सहेज लेते हैं
धर्मग्रन्थ सब जला चुकी है, जिसके अंतर की ज्वाला,
मंदिर, मसजिद, गिरिजे, सब को तोड़ चुका जो मतवाला,
पंडित, मोमिन, पादिरयों के फंदों को जो काट चुका,
कर सकती है आज उसी का स्वागत मेरी मधुशाला।
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