सूरज देव सिंह जी की कविता बढते कदम बहुत ही अच्छी लगी। यहाँ अपनी सहूलियत के लिए सहेज रहा हूँ आशा है वह बुरा नहीं मानेंगे.
इन बढते हुये कदमो को न रोकना कभी
मुश्किलो को देख कर हिम्मत न छोडना कभी
लोग कहेगे बहुत कुछ सून के न बहकना कभी
रास्ते कठीन हो फिर भी मन्जिल से पहले न रुकना कभी
कठीन कुछ भी नही है, कह के असम्भव पीछे न हटना कभी
आसान हो जायेगी मंजिल कदम पहला तो बढाना कभी
आसमाँ आ जायेगा हाथ मे जी से हाथ को ऊपर उठाना कभी
कारवाँ बन ही जायेगा कदम अपना आगे बढाना कभी
ऐसा क्यों है कि हमें हमेंशा बढ़ना अच्छा लगता है। शेयर मार्कट भी उन्हें ही सराहती है जो भविष्य में उन्नति दिखाते हैं।
3 Responses
raj
अक्तूबर 13th, 2005 at 3:47 am
1bahut sunder……..
Kanishk
अक्तूबर 20th, 2005 at 4:56 pm
2Thats reallya nice one. I liked it..its kind of inspiring for me now when I am looking for employment.
Thanx for dropping on my blog and posting there. I have been reading blogs for quite a while, but I dont know how to write in hindi in blog. Can you tell me ?
पंकज नरुला
अक्तूबर 21st, 2005 at 7:28 am
3कनिष्क
हिन्दी में लिखना व ब्लॉग शुरु करना काफी आसान है। इस कड़ी पर जाईए
http://akshargram.com/sarvagya/index.php/Welcome
पंकज
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