अनूप भैया ने अपनी चिकाईगरी की शैली में लिखा कि माजरा क्या है। कहते हैं कि जो मन में आए लिखो और जाते जाते मेरे खाली दिमाग की खाली दीवारों पर स्याही भी(painting the mind) पोत गए कि मर्जी आप की है पर इंडिया शाइनिंग और मेरा भारत परेशान पर भी लिख सकते हो। अब अनूप जी की मैं बड़ी इज्जत करता हूँ काश वे मेरे अम्बाला में होते तो मेरे भाई साहिब यानि बड़े मिर्ची सेठ से भी मिली आते। इसी बहाने भाई साहिब इन्हें एक आध मिर्ची की बोरी भी टिका देते कि यार अपने मुहल्ले के लाला को दे देना। कुछ बिक्री भी हो जाती। तो जैसे ही इस अनुगूँज का विषय पड़ा लगा मूली के पराँठे खाने का मूल्य चुकाने का टाईम आ गया है। इस बार लिख डालूँगा। ससुरा अमरीका में अभी २९ है अनूप जी के यहाँ तो ३० भी हो गई। गर अभी नहीं लिखा तो मार पड़ सकती है। आशा करते हैं कि ठलुआ जी के कान इस बार पक्के खींचे जाएगें। गर वे पढ़ रहैं हैं तो भईया चंद घंटे बाकी हैं लिख मारो नहीं तो अजातशत्रु का कोपबाण गूगल अरथ से धूमता हूआ आता ही होगा।
हाँ जी तो पहले माजरा यह है कि मैं बहुत बड़ाँ ढोंगी हूँ और जानता हूँ कि आप भी हैं। मैं सारे दिन एक मंगल को छोड़ कर चिकन खा लेता हूँ। कोई पूछे भईया क्यूँ मंगलवार को खाने वाला चिकन क्या मंत्रोचारण से काटते हूए शुद्ध तरीके से काटा गया था। पर क्या करुँ माँ कहती है मंगल भारी है। श्रीमती जी को भी अपनी तरफ मिला लिया है। हर मंगल पेशी होती है कि आज दोपहर में क्या खाया था। तो बस मंगल का चिकन नहीं खा सकते। देखा मेरा ढोंग। अपने ढोंग के बारे में टिप्पणी या अपने चिट्ठे पर प्रविष्टि करके बताने को आपको सादर निमंत्रण है।
इंडिया शाईनिंग ओर भारत परेशान के बारे में सोचता हूँ तो एक अंग्रेजी भैया हैं उनके लिखे की याद आती है। नाम है एलविन टॉफलर। सोचनें में इन्हें पक्का स्वर्ण पदक मिला होगा। इनकी पढ़ी पुस्तकों से लोग आडडिया लेकर पार्टी वगैरह में थोड़ा बुद्धिप्रदर्शन कर लेतें हैं। यह तो मैं पहले ही कह चुका हूँ कि मैं ढोंगी हूँ। इन्हीं मिंया की एक पुस्तक हैं थर्ड वेव जिस में यह मानव के विकास में आई तीन लहरें अथवा वेव्स के बारे में बात करते हैं। यदि इन महाशय की सोच उधार ले कर सोचा जाए तो माजरा क्या है थोड़ा बहुत समझ में आता है।
पहली लहर थी कृषि की, फिर आई औद्योगिक लहर और इसके उपरांत आई सूचना लहर। तो इन अलग अलग लहरों के घटने का समय अलग अलग था अपने पश्चिम में। वैसे भी भारत के स्वर्ण युग को तो हम गिन ही नहीं सकते और मैं लार्ड मैकॉले की शिक्षा नीति का अधपक्का उतपाद हूँ। खैर वह अलग बात है। कृषि लहर के लोग मिट्टी के धरों में रहते थे उनकी सोच भी मिट्ठी से जुड़ी थी। बड़े बड़े परिवार थे सब मिल जुल कर रहते थे। माँ बाप बच्चों से प्यार करते थे व उनकी ताजिंदगी देखभाल करते थे। बच्चे भी माँ बाप के बुढ़ापे की लाठी होते थे। फिर आई औद्योगिक लहर। लोग फैक्टरियों में आ गए। परिवार बस माँ बाप और बच्चों तक सीमित हो गए। बाप बेटे से बड़े होने पर घर में रहने पर किराए के बारे में सोचने लगा और बाप भी बच्चों के घर फोन करके व बेटे के अलग शहर में रहने पर होटल में रहने लगा। तलाक का शब्द भी गलियों में बड़ा गूँजने लगा। फिर आई सूचना लहर इहाँ तो मजे ही मजे हैं। एकदम प्राइवेट लाईफ है। बस कान पर आई पोड लगाया और अपनी ही दुनिया में मग्न। शादी की नहीं क्यूँकि कमिटमेंट माँगती है। बच्चों की जगह कुत्ते पाल लिए क्यूँकि कुत्ते को तो बस पहले साल ट्रेन करना पड़ता है फिर सारी उमर वैसे का वैसा। बच्चे का बचपन अलग, पढ़ाई फिर जवानी और पता नहीं क्या क्या। कुत्ते ही अच्छे हैं।
तो भाया उपर की तीनों लहरों के होने के समय़ पश्चिम में लगभग अलग अलग हैं। पर हुआ क्या कि चरक, आर्यभट्ट, पाणिनी, कालिदास, चाणक्य और चंद्रगुप्त के इस भारत में मुगलों के आने से थोड़े पहले से ही अंधकार छा गया और हमने कृषि युग से फिर से शुऱूआत की। अंग्रेज अपने साथ कुछ उद्योग भी लाए पर माल बहुत ले गए अपने यहाँ से। और यह सीमित भी रही गिने चुने लोगों तक। पता नहीं कैसे धक्के से हम लोग सूचना लहर में घुस गए। आज यह है हि कि अपने यहाँ हाई क्लास, अपर मिडल क्लास, मिडल मिडल क्लास, लोअर मिडल क्लास, लोआर क्लास के साथ हम लोग तीनो लहरों में जी रहे हैं। बैंगलोर में लोडे आई पोड लगा कर घूमते हैं, जबकि अपने अम्बाला में अभी भी बर्फ बाजार में बिकती है और बर्फ के कारखाने भी हैं। थोड़ा दूर गाँव चला जाऊं तो मिट्टी के धर बनाती औरते भी मिल जाएंगी। पर टी वी हर जगह हैं। इस से बड़ी मजेदार संस्कृति पैदा हो गई है। मुहल्ले की प्रिया आंटी घर में तो मैक्सी पहन कर धूमती हैं पर गली में सब्जी लेने वाला आए तो दुपट्टा ओढ़ कर बाहर आ जाती है। बच्चे आज कल लव अफेयर तो खूब चलाते हैं पर शादी फिर भी बड़े दहेज के साथ माँ बाप के कहने पर करते हैं।
अब कैसे न कहें माजरा क्या है।
4 Responses
अनूप शुक्ला
जून 30th, 2005 at 2:32 am
1अपने भइया के बरक्स बड़े कंजूस ठहरे। लेख इतना बढ़िया लिखा और सस्ते में निपटा दिया।लेख खतम हो गया पर हम इंतजार कर रहे हैं कि शायद कुछ और लिखा होता बहुत खुशी हुई लेख पढ़कर इतने दिन बाद।
अक्षरग्राम » Blog Archive » ११वीं अनुगूँज-माज़रा क्या है? आखिरी पुकार
जून 30th, 2005 at 2:51 am
2[…] याहरवीं अनुगूँज के समय की। जैसा कि पंकजजी ने बताया […]
Debashish
जुलाई 7th, 2005 at 11:29 pm
3Ye rating wali cheez badi badhiya lagi WP mein. How do you get the “top-rated” posts to be displayed on sidebar or something?
Sanjay Vidrohi
जुलाई 20th, 2005 at 6:34 am
4aapki Post padhi….achchhi lagi aur badhai dene ke liye aapko patra likhne baith gaya.Bhai , aapse parichay hua…blog-vigyan ko shukriya.
-Sanjay
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