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	<title>Comments on: स्वदेस</title>
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	<description>मिर्ची सी जिंदगी, कभी मंदी कभी तेज</description>
	<pubDate>Sun, 06 Jul 2008 06:30:49 +0000</pubDate>
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		<title>By: देबाशीष</title>
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		<author>देबाशीष</author>
		<pubDate>Wed, 29 Dec 2004 09:03:23 +0000</pubDate>
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		<description>खेद की बात है कि यह फिल्म पुरस्कार पाने और ओवरसीज़ बाज़ार के लिए ही बनाइ गई, नाम भी रखा "स्वदेस" स्वदेश नहीं। हम लोग गोरी चमड़ी और गोरों की बनाई हर चीज़, जैसे आस्कर, के इतने कायल हैं और फिल्मफेयर जैसे पुराने घरेलू पुरस्कारों को जूती पर रखते हैं। लॉबिंग आस्कर के लिए भी कम नहीं होती, पर घरेलू पुरस्कारों पर अक्सर बेईमानी का आरोप लगता है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>खेद की बात है कि यह फिल्म पुरस्कार पाने और ओवरसीज़ बाज़ार के लिए ही बनाइ गई, नाम भी रखा &#8220;स्वदेस&#8221; स्वदेश नहीं। हम लोग गोरी चमड़ी और गोरों की बनाई हर चीज़, जैसे आस्कर, के इतने कायल हैं और फिल्मफेयर जैसे पुराने घरेलू पुरस्कारों को जूती पर रखते हैं। लॉबिंग आस्कर के लिए भी कम नहीं होती, पर घरेलू पुरस्कारों पर अक्सर बेईमानी का आरोप लगता है।</p>
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		<title>By: जितेन्द्र चौधरी</title>
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		<author>जितेन्द्र चौधरी</author>
		<pubDate>Wed, 29 Dec 2004 08:08:23 +0000</pubDate>
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		<description>पंकज भाई,
फिल्म तो अच्छी बनी है, लेकिन कई जगह पर बोझिल होने लगती है,कभी कभी यह डाक्यूमेन्ट्ररी लगने लगती है.तकनीकी पक्ष भी कुछ कमजोर दिखता है, संगीत तो बस एवरेज ही है, "चला चल", और "ये देश है तेरा....स्वदेश है.." को छोड़कर कोई भी गीत गुनगुनाने लायक नही है.

लोगो ने स्वदेश देखकर लगान से तुलना करना शुरु कर दी, जो स्वाभाविक ही था, क्योकि लगान के बाद आशीष की यह दूसरी फिल्म थी. फिल्म का सबसे सशक्त पक्ष है कलाकारो की एक्टिंग, जो एकदम स्वाभाविक है, डायरेक्टर ने कहानी के साथ पूरा इन्साफ करने की कोशिश की है, फोटोग्राफी कई जगह निराश करती है, डायलाग और स्क्रीन प्ले पर कुछ और काम किया जा सकता था. कुल मिलाकर स्वदेश एक अच्छी फिल्म तो है, जो विदेशो मे चलेगी लेकिन देश मे शायद पिट जाय.
</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>पंकज भाई,<br />
फिल्म तो अच्छी बनी है, लेकिन कई जगह पर बोझिल होने लगती है,कभी कभी यह डाक्यूमेन्ट्ररी लगने लगती है.तकनीकी पक्ष भी कुछ कमजोर दिखता है, संगीत तो बस एवरेज ही है, &#8220;चला चल&#8221;, और &#8220;ये देश है तेरा&#8230;.स्वदेश है..&#8221; को छोड़कर कोई भी गीत गुनगुनाने लायक नही है.</p>
<p>लोगो ने स्वदेश देखकर लगान से तुलना करना शुरु कर दी, जो स्वाभाविक ही था, क्योकि लगान के बाद आशीष की यह दूसरी फिल्म थी. फिल्म का सबसे सशक्त पक्ष है कलाकारो की एक्टिंग, जो एकदम स्वाभाविक है, डायरेक्टर ने कहानी के साथ पूरा इन्साफ करने की कोशिश की है, फोटोग्राफी कई जगह निराश करती है, डायलाग और स्क्रीन प्ले पर कुछ और काम किया जा सकता था. कुल मिलाकर स्वदेश एक अच्छी फिल्म तो है, जो विदेशो मे चलेगी लेकिन देश मे शायद पिट जाय.</p>
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