हर बार कि तरह इस बार भी सारी दुनिया के लिखने के बाद अपनी ढपली बजा रहा हूँ। फिल्म तो दो हफ्ते पहले देख ली थी, समीक्षा लिखने अब बैठ रहा हूँ। स्वदेस से बहुत लोगों को बहुत तरह की उम्मीदें थी। सबसे ज्यादा कि देखें लगान का निर्देशक क्या नया करके दिखाता है। नया तो भैया उसने कर के दिखाया। पर शायद बॉक्स ऑफिस को पंसद न आए। पर मुझे बहुत पंसद आया। गर आप फिल्म मजे के लिए देखने जा रहे हो तो भाई न ही जाओ। पर यदि आप एक आप्रवासी भारतीय की अपनी जड़ों से जुड़ने की जद्दोजहद की कहानी, कुछ बेहतर अदाकारी और जिंदगी देखना चाहते हैं तो जरुर देखिए।

मेरे अपने पंसदीदा सीन हैं मोहन भार्गव यानि शाहरुख खान के मैनेजर का मोहन का त्यागपत्र यह कह कर स्वीकारना
Mohan! Go light your bulb..
दूसरे पंसदीदा सीन में मोहन गाड़ी में बैठा है और गाड़ी स्टेशन पर रुकती है। एक 8-9 साल का बच्चा 25 पैसे पानी का गिलास कहता हुआ इधर से उधर घूम रहा है।
स्विस्तार समीक्षा आप इस कड़ी पर पढ़ सकते हैं।
2 Responses
जितेन्द्र चौधरी
दिसम्बर 29th, 2004 at 1:08 am
1पंकज भाई,
फिल्म तो अच्छी बनी है, लेकिन कई जगह पर बोझिल होने लगती है,कभी कभी यह डाक्यूमेन्ट्ररी लगने लगती है.तकनीकी पक्ष भी कुछ कमजोर दिखता है, संगीत तो बस एवरेज ही है, “चला चल”, और “ये देश है तेरा….स्वदेश है..” को छोड़कर कोई भी गीत गुनगुनाने लायक नही है.
लोगो ने स्वदेश देखकर लगान से तुलना करना शुरु कर दी, जो स्वाभाविक ही था, क्योकि लगान के बाद आशीष की यह दूसरी फिल्म थी. फिल्म का सबसे सशक्त पक्ष है कलाकारो की एक्टिंग, जो एकदम स्वाभाविक है, डायरेक्टर ने कहानी के साथ पूरा इन्साफ करने की कोशिश की है, फोटोग्राफी कई जगह निराश करती है, डायलाग और स्क्रीन प्ले पर कुछ और काम किया जा सकता था. कुल मिलाकर स्वदेश एक अच्छी फिल्म तो है, जो विदेशो मे चलेगी लेकिन देश मे शायद पिट जाय.
देबाशीष
दिसम्बर 29th, 2004 at 2:03 am
2खेद की बात है कि यह फिल्म पुरस्कार पाने और ओवरसीज़ बाज़ार के लिए ही बनाइ गई, नाम भी रखा “स्वदेस” स्वदेश नहीं। हम लोग गोरी चमड़ी और गोरों की बनाई हर चीज़, जैसे आस्कर, के इतने कायल हैं और फिल्मफेयर जैसे पुराने घरेलू पुरस्कारों को जूती पर रखते हैं। लॉबिंग आस्कर के लिए भी कम नहीं होती, पर घरेलू पुरस्कारों पर अक्सर बेईमानी का आरोप लगता है।
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