सरकारी नीतियों की वजह से भारत व रशिया दोस्त रहे हैं इसके फायदे नुक्सान तो खैर बहुत बड़ा मुद्दा है। यहाँ मैं किसी और ही चीज की बात कर रहा हूँ। कहते हैं कि दुनिया में हर चीज बिक सकती है हर चीज का बाजार है। बचपन से यह देखा भी है। पूरानी अखबारें, किताबें, कपड़ें. जंग लगा लोहा इत्यादि। शहर में कचरा बटरोने वाले भी सभी ने देखे हैं। पर क्या फ्यूज हुए बल्बों की मारकिट हो सकती है यानि कि कहीं पर फ्युज हुए बल्ब भी बिकें। तो जनाब ऐसा रशिया में होता था।
बात यह है कि समाजवाद के चलते हर चीज सरकार ही प्रदान करती थी। अब यदि आप के घर का बल्ब फ्यूज हो गया तो ऐसा नहीं कि आप बाजार गए और किरण इल्कट्रानिक्स वाले से जाकर लक्ष्मन सिलवेनिया लेकर पूरे घर के बदल डालोगे। सरकारी महकमें मे बताना पड़ता था कि बल्ब खराब हो गया है कर्पया नया बल्ब दे दें। पैसे नहीं लगते थे पर बल्ब मिलने में साल लग जाते थे। लेकिन वहीं पर यदि सरकारी महकमें में काम पर बल्ब खराब हो जाए तो झट से आ जाता था। अब तो आप समझ ही गए होंगे। जुगाड़ू लोग बाजार (काला) से थोड़े से पैसे खर्च कर फ्यूज बल्ब लगा कर ठीक वाला घर ले आते थे। है न सही जुगाड़ बिल्कुल देसी जुगाड़ की तरह।
साभार – मारजिनल रेवोलुशन
बुधवार की शाम, शाम के आठ बजे हैं। पोर्टलैंड से घर की फ्लाईट में अभी 40 मिनट हैं बोर हो रहा हूँ चारों और थके यात्रीगण अपनी अपनी फ्लाईट की प्रतीक्षा कर रहें। खाली बैठे ख्याल आया कि कुछ ब्लागिया गिटपिट की जाए।
कुछ दिन पहले मेरी पंसदीदा पुस्तक सिद्धार्थ तीसरी या चौथी बार सुनी थी। जब भी सिद्धार्थ सुनता हूँ कुछ न कुछ नया सीखने को मिलता है। आज कल जिस बात पर ज्ञानदत्त जी की तरह मानसिक हलचल चल रही है वह है आदमी के दिमाग मे चलते रहने वाली गुफ्तगू। बात है दूसरे से बढ़ कर दिखने दिखाने की। अगर मैं गाड़ी चला रहा हूँ तो मैं सब से अच्छा बाकी ऐवें ही हैं। अरे मैं इतनी पुस्तकें पढ़ता हूं आप तो बिल्कुल भी नहीं पढ़ते। अरे मेरी देखिए हम कितने अच्छे मां बाप हैं हमारा बेटा हमेंशा प्रथम आता है। अरे आप ने अभी तक टैक्स नहीं भरा हमने तो दो हफ्ते पहले ही भर दिया था। अच्छा आप इस बार छुट्टियों पर कहीं नहीं जा रहे हम लोग तो मांउट आबू कल ही हो कर आए।
यह नहीं कह रहा कि ऐसा सभी में होता है पर खास कर इलीट कहे जाने वाले या आभिजात्य वर्ग में यह बिमारी काफी पाई जाती है। मैं भी शायद इस बिमारी का किताबों व ज्ञानी होने के भर्म वाले डिपार्टमेंट मे रोगी था। इलाज चल रहा है लगता है छुटकारा मिल जाएगा।
चलिए काउंटर वाले कह रहे हैं कि हमारा विमान आ गया है। लप्पू बाबू बंद करके घर चलते हैं। देखते हैं घर जब ग्यारह बजे पहुंचेगे तो सात महीने कि बिटिया जागती होगी कि सो गई होगी।
जगजीत सिंह जी की एक गजल है – छड़यां दी जून बुरी – जोकी कुंवारो की जिंदगी ब्यान करती है। यू-टयूब पर फिर से सुनने का मौका मिला। पर गजल के शुरु का शेर इतना कत्ल था कि यहाँ लिख रहा हूं। संगीत मय सुनने के लिए यूटयूब है ही।
किसे वल ऑखिया मजनू नूं, ओए तेरी लैला दिसदी काली वे
मजनू मुड़ जवाब दित्ता ओ तेरी अक्ख न वेखण वाली ए
वेद वी चिट्टे ते कुरान वी चिट्टी विच श्याही रख दित्ती काली ए
गुलाम फरीद जित्थे अखियां लगियां ओथे की गोरी की काली वे
लोजी पाठक साहब जिन्होंने शुरुआती दौर में जेम्स हेडली चेज के नावलों का हिन्दी अनुवाद किया था अब पूरा सर्कल कर चुके हैं। उनके बहुचर्चित पैंसठ लाख की डकैती का अंग्रेजी संस्करण आया है। सुदर्शन पुरोहित जोकि सॉफ्टवेयर में काम करते हैं ने अंग्रेजी अनुवाद किया है। नाम है “Sixty Five Lakhs Heist” ज्यादा पढ़ने के लिए मिंट पर यहाँ पढ़ें।
एक तरह से तो अच्छा है कि अब चैनई, हैदराबाद व त्रिची में बैठे मानस भी पाठक साहब के पढ़ पाएंगे। पर सोचता हूँ कि क्या अनुवाद पाठक जी की पंजाबी मिश्रित शैली का मुकाबला कर पाएगा – अभी रमाकांत का कॉफी को विस्की का तड़का लगा कर पीना या फिर विमल का “तेरा भाणा मिठ्ठा लागे” गुरबाणी याद करना इत्यादि। वैसे अंग्रेजी बहुत समृद्ध भाषा है पर किसी की शैली को अनुवाद करना भी टेढा काम है। यदि कोई ब्लॉग बंधू अंग्रेजी अनुवाद पढ़े तो जरुर बताएं।
सुबह जब बिस्तर से निकलने में मुश्किल हो, तो अपने आप से कहो “ मुझे एक आदमी की तरह, काम पर जाना है। यदि मैं वही करने जा रहा हूँ जिस के लिए मेरा जन्म हूआ है – और जिस के लिए मैं इस दुनिया में लाया गया था तो मैं कैसे शिकायत कर सकता हूँ ? या फिर मैं इसी के लिए जन्मा था ? कम्बल के नीचे घुस कर मस्ती से सोने के लिए ?
–पर यहाँ कितना अच्छा है….
अच्छा तो तुम “अच्छा” लगने के लिए पैदा हूए थे ? इसके लिए नहीं कि तुम काम करो और उन्हें अनुभव करो ? तुम्हें पौधे, चींटियां और मकड़ियां नजर नहीं दिखती, सभी उन्हें निहित काम कर रहे हैं, दुनिया को अपने अपने तरीके से सही कर रहे हैं ? और तुम आदमी के हिस्से में दिया गया काम करने के लिए राजी नहीं हो ? तुम अपनी शक्ति के हिसाब से काम करने के लिए तत्पर नहीं हो ?
– पर सोना भी तो जरुरी है…
माना । पर प्रकृति ने हर चीज की एक सीमा बाँधी है – खाने व पीने जैसे ही। और तुम अपनी सीमा पार कर चुके हो। तुम कुछ ज्यादा ही सो चुके हो। पर काम का ज्यादा नहीं हुआ। वहाँ तुम कोटे से कम ही हो।
तुम अपने से प्यार नहीं करते। ऐसा होता तो तुम अपनी प्रकृति व यह आप से जो चाहती है से भी प्यार करते। और जो लोग अपने काम से प्यार करते हैं वे काम करते थकते नहीं, यहाँ तक कि वे नहाना, धोना या खाना भी भूल जाते हैं। क्या तुम्हें अपनी शक्ति की इतनी भी कद्र नहीं जैसे कि एक शिल्पकार को अपने शिल्प पर, नृतक को नृत्य, कंजूस को पैसे या फिर समाज में रूतबा पसंद लोगो को रुतबे से होती है ? जब वे अपने काम में मग्न होते हैं तो वे खाना, पीना व सोना छोड़ कर अपने काम को करना ज्यादा पसंद करते हैं।
हिन्दी चिट्ठों की दुनिया छोटी सी है। पिछले तीन-चार सालों में दसियों से हजारों चिट्ठों के सफर में पहली सीटों पर बैठने का भी मौका मिला। देबू के चिट्ठा विश्व से शुरु हुए सफर में नारद ने हिन्दी ब्लॉगिंग के शुरुआती दौर में अपनी अलग जगह बनाई। पिछले कुछ महीनों में नए चिट्ठाजगत, ब्लॉगवाणी एग्रीगेटर आरंभ हुए व अब हिन्दी ब्लॉगपाठकों के पास नई प्रविष्टियाँ पढ़ने के लिए काफी उपाय हैं। विभिन्न एग्रीगेटरों के चलते गुणीजनों में यह विचार उठे थे कि इतने संकलकों की कोई जरुरत नहीं है। लेकिन यदि कल न्यूयार्क टाईम्स के पैसे देकर पढ़े जा सकने वाली सामग्री को फ्री करने के फैसले को देखें तो पाएंगे कि याहू, गूगल इत्यादि की तरह संकलक जरुरी हैं
What changed, The Times said, was that many more readers started coming to the site from search engines and links on other sites instead of coming directly to NYTimes.com. These indirect readers, unable to get access to articles behind the pay wall and less likely to pay subscription fees than the more loyal direct users, were seen as opportunities for more page views and increased advertising revenue.
“What wasn’t anticipated was the explosion in how much of our traffic would be generated by Google, by Yahoo and some others,” Ms. Schiller said.
गेपिंग वोयड एक कलाकार व मशहूर ब्लॉगर हैं जो कि बिज़नेस कार्डस के पीछे कार्टून बनाते हैं। उनका नया कार्टून देखा भगवान न करे किसी को ऐसा दिन देखना पड़े
लोजी अब पक्का हो गया। टीवी से भारत की ग्रामीण महिलाओं का बहुत विकास हो रहा है। अब यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो की एमिली ऑस्टर तो यही कहती हैं। उन्होंने एक रिसर्च पेपर प्रकाशित किया है जिसका नतीजा यही है कि – भारत में गाँवों में केबल टीवी लगने के बाद
आप पूरा पेपर यहाँ से पढ़ सकते हैं। आप इस से कितने सहमत / असहमत हैं कमेंट द्वारा जरूर बतावें।
ग्रामीण महिलाओं के ऊपर तो एमिली जी ने पेपर लिख दिया पर शहरी महिलाओं की जिंदगी के ऊपर फर्क पर भी बात होनी चाहिए। अभी तो घरों में रोटी सीरियलों के टाइम के हिसाब से पकती है। दूसरी तीसरी के बच्चे पूछते हैं कि पापा पापा आप मम्मी को कब डाईवोर्स दोगे इत्यादि।
साभार – मारजिनल रेवोलुशन
आजकल लड़के लड़कियों को स्कूलों में यौन शिक्षा दी जानी चाहिए या नहीं पर बहस का बाजार गरम हो रहा है। सदैव मुस्कुराते शास्त्री जी ने पहले सर्व किया व नेशन-मास्टर के आंकड़ों को दिखाते हुए मत रखा कि देखिए इन पश्चिम वालों को – पिछले 50 सालों से शिक्षा दे रहे हैं पर कुछ फायदा नहीं हुआ दिखता। उलटे ब्लात्कार व यौन संबंधित अपराध बड़े ही हैं। यानि की यौन शिक्षा का लंबे समय से चलता आ रहा प्रयोग असफल।
शास्त्री जी के सर्व के जवाब में नीरज भाई रोहिल्ला ने बढ़िया वॉली की व अपनी दो टूक रखी। कि आंकड़ो-वांकड़ों से तो कुछ भी कहा जा सकता है। यौन शिक्षा दे रहे हैं इस लिए अपराध बढ़ रहे हैं कहना गलत होगा। नीरज जी के इस लॉजिक से में एक दम सहमत हूँ। अंग्रेजी में हिसाब व विज्ञान वालों के बीच एक कहावत चलती है – Correlation is not causation – यानि दो चीजों के परस्पर संबंध होने से कारण का होना पता नहीं चलता। एक कहानी सुनाता हूँ ज्यादा समझ में आएगा
पिंटू भाई वैज्ञानिक बड़े खुराफाती आदमी थे। जानवरों के साथ तरह तरह के पंगे वाले प्रयोग करते रहते थे। बगल के तालाब से एक मेंढक पकड़ लाए सोचे कि आज इस पर प्रयोग करेंगे। प्रयोगशाला में जाकर उसे कुछ धागों वगैरह से बांधा व फिर जोर से ताली बजाई - मेंढक जोर से उछला। फिर पिंटू भाई ने सर्जिकल ब्लेड लिया व चार में से एक टांग काट दी। फिर ताली बजाई। मेंढक फिर से उछला। अभी एक और टांग काट दी व ताली बजाई। मेंढक दो टांगों से जितना उछला सकता था उछला। अभी एक टांग और काट दी व ताली बजाई। मेंढक थोड़ा सा हिला। अभी पिंटू भाई ने रही सही एक टांग भी काट दी व इस बार फिर से ताली बजाई। मेंढक बिल्कुल न उछला।
प्रयोग का नतीजा – मेंढक की चारों टांगे काटने से मेंढक बहरा हो जाता है
अभी यौन शिक्षा के क्या नफे-नुक्सान हैं व भारत के परिपेक्ष में इसके क्या मायने हैं यह लम्बी बहस का मुद्दा है देखतें हैं हिन्दी जाल जगत में इस बारे में और लोग क्या कहते हैं।
छवि साभार – नारदक
आलोक भाई अभी अभी अमरीका से हो कर गए हैं, शायद यहाँ से कुछ खास चीज खाकर गए हैं ( समीर जी व जीतू भाई – अफसोस आलोक अपुन पियक्कड़ो जैसे नहीं हैं, नहीं तो लिखता खा-पीकर गए हैं)। इस लिए की जाते ही फटाक फटाक दो “बड़ी सी” प्रविष्टियां लिख डाली। बड़ी सी पर जोर इस लिए दे रहा हूँ कि आलोक अपनी कम लिखे को ज्यादा समझना – तार को खते समझना जैसी ब्लॉग पोस्टों के लिए बदनाम प्रसिद्ध हैं। खैर अगर ऐसी कोई बात है तो मैं आलोक से इस खाने वाली चीज के बारे में जरुर जानना चाहुंगा। श्रीमती जी कैमिस्ट्री की रिसर्च-स्नातक हैं उनसे कह कर इस चीज के अंदर के विटामिन निकलवाकर – बड़ी पोस्ट लिखने की गोली बना-बना कर बेचेंगे।
वैसे लिखना तो आलोक को पहले चाहिए था कि अमरीका उन्हें कैसा लगा। वैसा ही जैसा वे सोचते था या अलग। पर उन्होंने अपनी सोच की छिपकली सभी पर छोड़ दी अभी भाई लोग अनुगूंज में सोच सोच कर लिख रहे हैं। अब बड़े भाई ने कहा है तो लिखना तो पड़ेगा ही। तो लीजिए हमारी भी श्वेत-श्याम आहुति इस 22वीं अनुगूंज में। Read the rest of this entry »
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